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यहां नवरात्रि पर लगता है ‘भूतों का मेला’, होती हैं अजीब हरकतें… चारों तरफ से आती हैं चीखें.

 

Bihar : बिहार का रोहतास जिला एक अनोखी परंपरा का घर है, जो आज भी रहस्यमय और अंधविश्वास से भरा हुआ है। यहां हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान एक भयंकर और दिलचस्प मेला लगता है, जिसे स्थानीय लोग “भूतों का मेला” कहते हैं। यह परंपरा करीब 100 साल पुरानी है, और इसे देखने के लिए दूर-दूर से हर साल हजारों लोग आते हैं। इस मेले का स्थान है संझौली प्रखंड के घिन्हू ब्रह्म स्थान में, जहां का माहौल किसी सामान्य धार्मिक आयोजन से बिल्कुल अलग, बल्कि डरावना और रहस्यमय होता है।

आज का दौर विज्ञान और तकनीक का दौर है, जब इंसान चांद, मंगल तक पहुंच चुका है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन को बदल रही है, वहीं दूसरी ओर बिहार के इस इलाके में आज भी भूत-प्रेत और आत्माओं में गहरा विश्वास देखा जाता है। चैत्र नवरात्र के नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले में आसपास के गांवों और अन्य राज्यों से भी लोग हिस्सा लेने आते हैं। माना जाता है कि यहां आने से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव खत्म हो जाता है और भूत-प्रेत की बाधा दूर हो जाती है।

मेला का माहौल पूरी तरह से रहस्यमय है। यहाँ चीख-पुकार, अजीब हरकतें, और तंत्र-मंत्र की आवाजें हर तरफ सुनाई देती हैं। इसमें शामिल महिलाएं अक्सर खुले बालों के साथ चीख-चिल्लाती नजर आती हैं। कई महिलाएं जमीन पर लोटती हैं या दौड़ती हैं, मान्यता है कि इन पर “भूत सवार” होता है। तांत्रिक लोग मंत्रोच्चार, झाड़-फूंक और तंत्र क्रियाओं के जरिए पीड़ितों को ठीक करने का दावा करते हैं। कई बार वे पीड़ितों को जोर-जोर से झकझोरते हैं और यहां तक कि मारपीट भी करते हैं। इनका मानना है कि वे शरीर में मौजूद आत्मा को बाहर निकालते हैं, ताकि वह शरीर छोड़कर भाग जाए।

मेले में जानवरों की बलि दी जाती है, खासकर मुर्गे की। ऐसा माना जाता है कि इससे नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और पीड़ित को राहत मिलती है। तांत्रिकों का दावा है कि उन्होंने सैकड़ों लोगों को भूत-प्रेत से मुक्ति दिलाई है। इनका कहना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और अभी भी हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है।

यह मेला हर साल दो बार, चैत्र और शारदीय नवरात्र में आयोजित होता है। इसमें लाखों की संख्या में लोग भाग लेते हैं, जिनमें से अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मेले का संबंध घिन्हू ब्रह्म नामक व्यक्ति से है, जो मूल रूप से बिक्रमगंज प्रखंड के माधवपुर गांव के निवासी थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी ताकत दिखाने के लिए जमीन में गड़े एक कील को उखाड़ दिया, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्होंने पानी मांगा, लेकिन लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। इससे आहत होकर उन्होंने रौनी और पौनी गांव को श्राप दे दिया। बाद में उन्होंने प्राण त्याग दिए, और उनके नाम से ही इस स्थान का नाम “घिन्हू ब्रह्म स्थान” पड़ा।

स्थानीय लोगों का मानना है कि घिन्हू ब्रह्म का श्राप आज भी असर दिखाता है। पौनी गांव धीरे-धीरे उजड़ गया, जबकि रौनी गांव आज भी आबाद और समृद्ध है। खास बात यह है कि इस मेले में पूर्ण शराबबंदी के बावजूद शराब की बोतलें देखी जाती हैं, जो कभी-कभी “चढ़ावा” के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं। यह परंपरा आस्था और अंधविश्वास के बीच की एक पतली रेखा को दर्शाती है, जहां लोग इसे अपनी समस्याओं का समाधान मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं से भी जोड़ता है।

यह मेला आज भी हजारों लोगों के लिए विश्वास और अंधविश्वास का अटूट केंद्र बना हुआ है, जो आधुनिक दुनिया के बीच एक रहस्यमय परंपरा के रूप में कायम है। हर साल यह मेले का आयोजन होते ही लोगों की जिज्ञासा और आस्था दोनों जागरूक हो उठती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये परंपरा सच में भूत-प्रेत और आत्माओं पर भरोसा है या फिर यह समाज के डर और अंधविश्वास का एक भाग मात्र है? अभी भी यह रहस्य बना हुआ है, जो बिहार की इस अनोखी परंपरा को और भी रहस्यमय बनाता है।

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