श्री दुर्वेश्वर महादेव : प्राचीन काल में महर्षि दुर्वासा ने इसी तपोभूमि पर की थी कठोर साधना

देवभूमि हिमाचल प्रदेश की वादियों में आस्था और प्रकृति का जो अद्भुत संगम दिखाई देता है, वह मनुष्य को सहज ही आध्यात्मिक अनुभूति से भर देता है। कांगड़ा जिला की धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में, धर्मशाला से लगभग दस किलोमीटर दूर नड्डी के समीप डल क्षेत्र में स्थित श्री दुर्वेश्वर महादेव मंदिर ऐसा ही एक पावन तीर्थ है, जहां श्रद्धा, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य एकाकार हो उठते हैं।
मंदिर के ठीक सम्मुख स्थित शांत जलराशि से युक्त डल झील इस स्थल की आध्यात्मिक आभा को और भी गहन बना देती है। (आजकल झील के पुनरुद्धार का कार्य प्रगति पर है) मान्यता है कि प्राचीन काल में महर्षि दुर्वासा ने इसी तपोभूमि पर कठोर साधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। महर्षि ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि जनकल्याण की भावना से तपस्थली के समीप जल की व्यवस्था का वर चाहा।
शिव ने उनकी कामना स्वीकार की और सप्तऋषियों के प्रतीक रूप में सात जलधाराएं फूट पड़ीं। वही जलधाराएं आगे चलकर एकत्रित हुईं और डल झील के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। कालांतर में यहां महादेव की स्थापना हुई और यह स्थल (छोटा मणिमहेश) के रूप में विख्यात हो गया। श्रद्धालुओं की आस्था है कि यहां स्नान एवं परिक्रमा से वही पुण्यफल प्राप्त होता है, जो भरमौर स्थित पवित्र मणिमहेश यात्रा से मिलता है।
इतिहास के अनुसार इस मंदिर का निर्माण लगभग दो शताब्दी पूर्व घरोह निवासी श्री कलेशर सिंह राणा ने करवाया था। समय के थपेड़ों के बावजूद मंदिर आज भी श्रद्धा की ज्योति प्रज्वलित किए खड़ा है। जन्माष्टमी के पंद्रह दिन पश्चात राधाष्टमी के अवसर पर यहां विशाल मेला आयोजित होता है।
शिवरात्रि का पर्व भी गहन श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को आसपास के गांवों की महिलाएं व्रत रखकर महादेव की पूजा-अर्चना करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। राधाष्टमी के दिन प्रात: चार बजे से शुभ मुहूर्त में स्नान आरंभ होता है, जो दिन भर चलता है। तत्ता स्नान और ठंडा स्नान की परंपरा यहां विशेष महत्त्व रखती है, यदि मेले की तिथि संक्रांति से बीस दिन बाद आती है तो ठंडा स्नान और बारह दिन पूर्व पडऩे पर तत्ता स्नान किया जाता है।
लोकमान्यता में तत्ता स्नान को विशेष पुण्यदायी माना गया है। झील तट पर एक विशिष्ट परंपरा भी निभाई जाती है। प्राचीन मंदिर से भगवान शंकर के कलश को शोभायात्रा के रूप में झील तक लाया जाता है और जल में डुबोकर शुद्धि की रस्म निभाई जाती है। इसके पश्चात पुजारी स्नान करते हैं और कलश को पुन: मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है। आरती और पूजन के बाद श्रद्धालुओं का स्नान क्रम प्रारंभ होता है।
जो श्रद्धालु किसी कारणवश मणिमहेश यात्रा नहीं कर पाते, वे यहां स्नान और दर्शन कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। आध्यात्मिक महिमा के साथ-साथ डल झील का पर्यावरणीय महत्त्व भी कम नहीं है। यह एक प्राकृतिक जल निकाय है, जो आसपास की पहाडिय़ों के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में सहायक है। देवदार से घिरी यह झील पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी है।
किंतु समय के साथ झील में गाद जमने और सफाई अभियानों के बाद उत्पन्न रिसाव की समस्या ने इसकी जल धारण क्षमता को प्रभावित किया है। श्री दुर्वेश्वर महादेव मंदिर केवल एक प्राचीन स्थापत्य नहीं, बल्कि जीवंत आस्था का केंद्र है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में जब मन निरंतर विचलित रहता है, तब नड्डी स्थित यह पावन स्थल आत्मिक संतुलन और आंतरिक शांति का संदेश देता है।
यह तीर्थ हमें स्मरण कराता है कि श्रद्धा, प्रकृति और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण में ही जीवन की वास्तविक सार्थकता निहित है। निस्संदेह धौलाधार की छाया में अवस्थित यह तपोभूमि हिमाचल की आध्यात्मिक विरासत का उज्ज्वल अध्याय है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम इसकी पवित्रता, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखने में अपना दायित्व समझें, ताकि आने वाली पीढिय़ां भी इस दिव्य संगम में शिवत्व का अनुभव कर सकें।
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