सीमांचल में चल रहा था फर्जी आधार कार्ड का बड़ा खेल; यूपी और बंगाल से जुड़े तार, ऐसे होता था पूरा फर्जीवाड़ा

किशनगंज/लखनऊ: बिहार के सीमांचल क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। पुलिस ने फर्जी आधार कार्ड बनाने वाले एक ऐसे अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसके तार उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अधिकृत केंद्रों से जुड़े हुए हैं। नेपाल और बांग्लादेश की सीमा के करीब स्थित किशनगंज जिला इस अवैध नेटवर्क का मुख्य केंद्र बना हुआ था, जहां किराना दुकानों और साइबर कैफे की आड़ में ‘नकली पहचान’ तैयार की जा रही थी।
यूपी-बंगाल के अधिकृत केंद्रों से मिलीभगत
पुलिस जांच में जो खुलासा हुआ है, वह तंत्र की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करता है। गिरोह के सदस्य उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के सरकारी मान्यता प्राप्त आधार केंद्रों के संचालकों के साथ सांठगांठ करते थे। ये संचालक चंद रुपयों के लालच में आधार पंजीकरण के लिए मिलने वाले अपने निजी लॉगिन आईडी और पासवर्ड गिरोह को उपलब्ध करा देते थे। इतना ही नहीं, जांच में फिंगरप्रिंट क्लोन तैयार करने की बात भी सामने आई है, जिससे असली पहचान की आड़ में फर्जी कार्ड बनाना आसान हो जाता था।
एनीडेस्क और रिमोट एक्सेस का ‘हाईटेक’ खेल
यह गिरोह तकनीक का दुरुपयोग करने में भी माहिर है। पुलिस के मुताबिक, एनीडेस्क (AnyDesk) जैसे रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर के जरिए दूसरे राज्यों में बैठकर बिहार के ग्रामीण इलाकों में आधार कार्ड जेनरेट किए जा रहे थे। एक फर्जी आधार कार्ड बनाने के बदले लोगों से 2,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक वसूले जाते थे। इस काली कमाई का 20 से 40 फीसदी हिस्सा उन केंद्रों को कमीशन के तौर पर दिया जाता था, जो अपना लॉगिन एक्सेस गिरोह को देते थे।
दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ और जाली मुहरें
इस फर्जीवाड़े का जाल सिर्फ आधार कार्ड तक ही सीमित नहीं था। गिरोह के सदस्य लोगों से उनके असली निवास और जन्म प्रमाण पत्र इकट्ठा करते थे और फिर सॉफ्टवेयर की मदद से उनमें नाम, पता और जन्मतिथि बदल देते थे। इसके बाद फर्जी हस्ताक्षर और जाली सरकारी मुहरें लगाकर उन्हें पूरी तरह ‘वैध’ दिखने वाला रूप दे दिया जाता था। इन फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल बैंक खाते खोलने और अवैध रूप से सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए किया जा रहा था।
पुलिस की बड़ी कार्रवाई और चुनौतियां
प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस नेटवर्क का अंतरराज्यीय विस्तार है। पिछले एक साल में पुलिस ने कई आरोपियों को दबोचा है, लेकिन मुख्य सरगना अब भी पकड़ से बाहर हैं। चूंकि इस मामले के तार यूपी और बंगाल के विभिन्न जिलों से जुड़े हैं, इसलिए बिहार पुलिस अब अन्य राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर संयुक्त ऑपरेशन चलाने की तैयारी में है। सीमावर्ती इलाकों में इस तरह के फर्जीवाड़े को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा माना जा रहा है।
No comments