वंदे मातरम पर जमीयत का आर-पार! अरशद मदनी बोले- सरकार ने फैसला नहीं बदला तो कोर्ट जाएंगे

नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम को अनिवार्य किए जाने के प्रस्तावित निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया है। जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यदि सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो संगठन इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाएगा।
यह बयान जमीयत उलेमा-ए-हिंद की दो दिवसीय कार्य समिति अधिवेशन के समापन अवसर पर दिया गया। अधिवेशन में एसआईआर, विधानसभा चुनाव, जनगणना और देश के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि वंदे मातरम उनके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध है और इसे अनिवार्य बनाकर मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार जीवन जीने की आजादी देता है और किसी गीत को अनिवार्य बनाना उस भावना के विपरीत है।
अधिवेशन में केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने और उसके सभी छह बंद अनिवार्य करने जैसे प्रस्तावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया। प्रतिनिधियों ने इसे भारतीय संविधान की मूल भावना, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और संविधान सभा के ऐतिहासिक निर्णयों के खिलाफ बताया। संगठन ने सरकार से इस फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की।
अधिवेशन में पश्चिम बंगाल और असम के मुख्यमंत्रियों के हालिया बयानों पर भी चिंता जताई गई, जिनमें हिंदुओं के वोट से सत्ता में आने और उनके हितों के लिए काम करने की बात कही गई थी। जमीयत नेताओं ने ऐसे बयानों को सामाजिक सौहार्द के लिए नुकसानदायक बताया।
इसके अलावा मौलाना मदनी ने मस्जिदों, मकबरों और मदरसों को अवैध बताकर गिराए जाने की घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जल्द ही केंद्रीय और प्रांतीय स्तर पर मदरसा बोर्ड गठित किए जाएंगे, ताकि मदरसों से जुड़ी समस्याओं का सामूहिक समाधान किया जा सके।
एसआईआर के मुद्दे पर उन्होंने मुसलमानों से सतर्क और जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि सभी आवश्यक दस्तावेज पहले से तैयार रखें, ताकि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया में परेशानी का सामना न करना पड़े।
No comments