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पति की मौत के बाद बाजारों में पिलाया पानी, अब दो बच्चों के बिछड़ने के गम में टकटकी लगाए बैठी है रानी देवी.

 

  • मेहनत-मजदूरी से संवारा बच्चों का भविष्य, मगर नियति ने छीन ली घर की खुशियां

सीतापुर : मछरेहटा कस्बे के कजियारा मोहल्ले की तंग गलियों में रहने वाली रानी देवी की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि उस असीम धैर्य की भी है, जो एक मां अपने बच्चों के लिए जुटाती है। करीब 11 साल पहले जब पति आशाराम की लंबी बीमारी ने उनका साथ छीन लिया, तो पांच छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और पहाड़ जैसा जीवन उनके सामने था। गरीबी ने पैर पसार रखे थे, लेकिन रानी देवी ने हार मानने के बजाय मेहनत का रास्ता चुना।

वह कस्बे के बाजारों में दुकानदारों को पानी पिलाने का काम करने लगीं। तपती धूप हो या कड़ाके की ठंड, वह हर दिन इस उम्मीद में निकलतीं कि शाम तक बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके। दुकानदारों से मिलने वाले चंद रुपयों और थोड़ी-बहुत सब्जी-राशन के सहारे उन्होंने न सिर्फ बच्चों का पालन-पोषण किया, बल्कि अपनी दो बेटियों रूपा और मंजीता के साथ बेटे चंद्रिका का विवाह भी संपन्न कराया।

मगर नियति को शायद रानी देवी की ये छोटी-सी खुशियां भी रास नहीं आईं। संघर्षों से जूझती इस मां के कलेजे पर तब वज्रपात हुआ, जब तीन साल पहले उनका 15 वर्षीय मानसिक रूप से दिव्यांग बेटा शिवदत्त अचानक लापता हो गया। बेटे की तलाश में उन्होंने हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसका कहीं सुराग नहीं लगा।

जख्म अभी भरा भी नहीं था कि पिछले साल उनकी 13 वर्षीय मासूम बेटी जूली भी कहीं गुम हो गई। आज रानी देवी के घर में खामोशी का पहरा है। समाज उनकी हिम्मत की मिसाल देता है कि कैसे एक अकेली महिला ने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को संभाला, लेकिन उनकी नम आंखें आज भी दरवाजे की ओर टकटकी लगाए रहती हैं।

दो बच्चों के बिछड़ने का यह दर्द उनके चेहरे की झुर्रियों में साफ पढ़ा जा सकता है। वह आज भी उनके लौट आने की आस में हर रोज घुट-घुटकर जी रही हैं।

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