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कारगिल वीर लालमणि यादव को 27 साल बाद भी सम्मान का इंतजार, प्रतिमा स्थापना पर विवाद

Prayagraj : करछना कारगिल विजय दिवस पर जब पूरा देश अपने वीर शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है, तब करछना क्षेत्र के बसही पतुलकी गांव में कारगिल शहीद नायक लालमणि यादव का परिवार आज भी एक अधूरे सम्मान का दर्द अपने सीने में संजोए हुए है। देश की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले इस वीर सपूत की प्रतिमा शहादत के 27 वर्ष बाद भी गांव में स्थापित नहीं हो सकी है। गांव का विवाद और स्थानीय राजनीति उनके सम्मान के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी है।

नायक लालमणि यादव का जन्म 16 जुलाई 1963 को बसही पतुलकी गांव में सूरजदीन यादव के घर हुआ था। बाद में परिवार नैनी जाकर बस गया। वर्ष 1981 में वे भारतीय सेना की 13 कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान 4 सितंबर 1999 को तुरतुक सेक्टर के सब सेक्टर हनीफ में दुश्मनों से लोहा लेते हुए उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया और 6 सितंबर 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

उस समय उनकी बड़ी बेटी मंजू मात्र 12 वर्ष, अंजू 10 वर्ष, जबकि बेटे आलोक और विवेक क्रमशः 8 और 6 वर्ष के थे। आज दोनों बेटियां अपने पिता की यादों को संजोए हुए हैं। आलोक यादव का विवाह हो चुका है, जबकि छोटे बेटे विवेक का विवाह अभी नहीं हुआ है। शहीद की स्मृति में गांव में स्मारक का निर्माण कराया गया और प्रतिमा स्थापना के लिए 70 हजार रुपए की धनराशि भी स्वीकृत हुई। प्रधान प्रतिनिधि हिमांशु यादव के अनुसार प्रतिमा पूरी तरह तैयार है। 26 जुलाई को जिलाधिकारी प्रयागराज के हाथों उसका अनावरण प्रस्तावित था, लेकिन गांव के विवाद के कारण कार्यक्रम टल गया और प्रतिमा आज भी स्थापना की प्रतीक्षा कर रही है।

कारगिल विजय दिवस पर परिजनों की आंखों में एक ही सवाल है—जिस वीर ने देश की आन-बान-शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, क्या उसे अपने ही गांव में सम्मान की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। परिजनों और ग्रामीणों का कहना है कि शहीदों का सम्मान किसी विवाद या राजनीति का विषय नहीं होना चाहिए। शहीद लालमणि यादव की प्रतिमा का शीघ्र अनावरण ही उनके बलिदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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