माता-पिता की टूट गई सांसें, पर भाई को ... 15 साल बाद शहर के कोठे पर मिली बहन, आंखें भर आएंगी इस कहानी को सुनकर..
उस दिन भी मौसम कुछ ऐसा ही था. सुबह बादलों की आवाजाही रही, लेकिन दोपहर तक धूप निकल आई. गांव के बच्चों के लिए इससे बड़ा मौका और क्या होता? गर्मियों की छुट्टियों की मस्ती अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी.
कोई मिट्टी के घर बना रहा था, कोई गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचा रहा था तो कुछ बच्चे पानी से भरे गड्ढों को फांदते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे. इसी गांव की एक झोपड़ी में रामभजन (बदला हुआ नाम) का परिवार रहता था. गरीबी जरूर थी, लेकिन घर बच्चों की खिलखिलाहट से भरा रहता था. सबसे छोटी बेटी रजनी (बदला हुआ नाम), जिसकी उम्र महज आठ साल थी, उस दिन भी अपने दोस्तों के साथ पकड़म-पकड़ाई खेल रही थी.
बीन की आवाज ने बदल दी पूरी कहानी
अचानक हवा में एक लंबी और धीमी धुन गूंजी. किसी बच्चे ने सबसे पहले सुना और जोर से चिल्लाया, "अरे... सपेरा आया है!" बस फिर क्या था. खेल बीच में ही छूट गया और सभी बच्चे गली के मोड़ की तरफ भाग पड़े. वहां एक सपेरा अपनी टोकरी के साथ खड़ा था. उसने धीरे-धीरे ढक्कन हटाया तो भीतर से फन फैलाए दो सांप बाहर निकल आए. बीन की धुन पर लहराते सांपों को देखकर बच्चे डर भी रहे थे और रोमांचित भी थे. रजनी सबसे आगे खड़ी होकर यह तमाशा देख रही थी. कुछ देर बाद सपेरा अपनी टोकरी समेटकर दूसरे मोहल्ले की ओर बढ़ गया. उसके पीछे-पीछे कई बच्चे भी चल पड़े. रजनी भी उन्हीं में शामिल थी.
शाम ढली... लेकिन रजनी घर नहीं लौटी
धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा. गांव में चूल्हे जलने लगे, मंदिर की घंटियां बजने लगीं और मांएं बच्चों को घर बुलाने लगीं. एक-एक कर सभी बच्चे लौट आए, लेकिन रजनी का कहीं पता नहीं था. पहले घरवालों ने सोचा कि वह पड़ोस में होगी, लेकिन काफी देर तक तलाशने के बाद भी जब उसका कोई सुराग नहीं मिला तो चिंता बढ़ गई. रामभजन और उनकी पत्नी मीना (बदला हुआ नाम) पूरे गांव में बेटी को ढूंढते रहे. बड़ा भाई अर्जुन (बदला हुआ नाम) खेतों, तालाब, बस अड्डे और आसपास के हर कोने तक पहुंच गया.
रात बीत गई, लेकिन रजनी नहीं मिली
कुछ दिन तलाश हुई... फिर फाइल धूल खाती रह गई. अगले दिन थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई गई. पुलिस ने पूछताछ की, सपेरों की तलाश की बात कही और गांव वालों ने भी कई दिन तक खोजबीन की, लेकिन समय बीतता गया. बरसात खत्म हुई, त्योहार आए और चले गए. पुलिस की फाइल पुरानी पड़ गई. गांव वालों ने भी पूछना छोड़ दिया.
मगर रामभजन और मीना हर शाम गली की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखते रहते. उन्हें लगता, शायद आज उनकी बेटी लौट आए. यह इंतजार धीरे-धीरे उन्हें भीतर से तोड़ता चला गया.
बेटी के गम में माता-पिता ने गंवाई जान, भाई ने नहीं छोड़ी उम्मीद
कुछ समय बाद रामभजन की बीमारी से मौत हो गई. बेटी के गम में डूबी मीना भी ज्यादा दिन तक नहीं जी सकीं. मां-बाप चले गए, लेकिन भाई ने उम्मीद नहीं छोड़ी. घर की जिम्मेदारी अब अर्जुन के कंधों पर थी. उसने शादी की, परिवार बसाया और मेहनत-मजदूरी करके बच्चों का पालन-पोषण शुरू किया. लेकिन बहन की तलाश कभी खत्म नहीं हुई. करीब 15 साल गुजर गए. उसे नहीं पता था कि रजनी जिंदा भी है या नहीं, फिर भी हर अनजान चेहरे में उसे अपनी बहन दिखाई देती थी.
कमाई के बहाने बहन को ढूंढने शहर निकला भाई
आखिर एक दिन अर्जुन ने अपनी पत्नी से कहा कि वह शहर जाकर काम करेगा. असल में उसका मकसद सिर्फ कमाई नहीं था. वह बहन को तलाशने निकला था. अर्जुन हर सुराग के पीछे भागता रहा. शहर पहुंचकर अर्जुन ने अपनी पहचान छिपा ली. कभी रिक्शा चलाया, कभी मंडी में बोरे ढोए, कभी ट्रकों से सामान उतारा. दिन भर मजदूरी करता और रात को फुटपाथ पर लेटकर यही सोचता कि शायद किसी दिन बहन का कोई सुराग मिल जाए.
बहन का पता चला तो पैरों तले से सरक गई जमीन
महीनों की भागदौड़ के बाद एक शाम किसी ने धीमी आवाज में उससे कहा कि शहर के कांच बाजार इलाके के एक कोठे पर शायद उसकी बहन मौजूद है. यह सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई. जिस गली में लोग जाने से डरते थे, वहां पहुंच गया भाई. कांच बाजार बदनाम इलाके के रूप में जाना जाता था. तंग गलियां, लाल रोशनी और उन कमरों में कैद अनगिनत जिंदगियां. कई दिन तक अर्जुन हिम्मत नहीं जुटा पाया. आखिर एक रात वह वहां पहुंचा. ऊपर जाकर उसने एक महिला को देखा. चेहरे पर वक्त की मार साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उसे लगा कि यही उसकी बहन है.
बहन को वहां देखने के बाद फूट-फूट कर रोया भाई
अर्जुन चुपचाप नीचे उतर आया और फूट-फूटकर रो पड़ा. 'जीजी' बनीं उम्मीद की आखिरी किरण. इसी दौरान उसे एक ऐसी महिला के बारे में पता चला, जिन्हें लोग प्यार से 'जीजी' कहते थे. वर्षों से वह देह व्यापार में फंसी लड़कियों और महिलाओं को बाहर निकालने का काम कर रही थीं. अर्जुन ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई. जीजी ने बिना देर किए अपनी टीम के साथ उस कोठे का रुख किया. वहां कुछ देर तक बहस और रोक-टोक हुई, लेकिन टीम पीछे नहीं हटी.
सालों के बाद भाई को मिली बड़ी कामयाबी
जब रजनी से पूछा गया, "बेटी, क्या तुम ही रजनी हो?" तो उसने बिना कुछ कहे हल्के से सिर हिला दिया. उसी पल उसकी नजर अर्जुन पर पड़ी. "भइया..." और पंद्रह साल का दर्द आंसुओं में बह निकला. कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे. फिर रजनी की जुबान से सिर्फ एक शब्द निकला-"भइया..." इसके बाद वह भाई से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी. वहां मौजूद कई लोगों की आंखें भी नम हो गईं. जीजी भी इस भावुक पल को देखकर खुद को संभाल नहीं सकीं. सालों बाद भाई अपनी बहन को उस दलदल से बाहर निकालने में कामयाब हुआ.
काश... मां और पिता जी आज जिंदा होते
घर लौटी बहन, लेकिन खुशी अधूरी रह गई. जब अर्जुन बहन को लेकर गांव पहुंचा तो घर का माहौल पूरी तरह बदल गया. पत्नी ने खाना बनाया, बच्चों ने पहली बार अपनी बुआ के साथ बैठकर बातें कीं और अर्जुन देर रात तक बहन को देखता रहा. लेकिन उसके मन में एक टीस हमेशा बनी रही. काश... मां और पिता आज जिंदा होते. उन्हें अपनी बेटी के लौटने का इंतजार सबसे ज्यादा था. सबसे दर्दनाक बात यह थी कि रजनी किसी दूसरे देश या राज्य में नहीं थी. वह घर से कुछ ही किलोमीटर दूर, उसी शहर में पिछले 15 साल से कैद जिंदगी जी रही थी.
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