5500 साल पुराना सदाशिव ध्यूंसर महादेव मंदिर, नक्काशी देख अचंभित रह जाते हैं लोग

धौम्य ऋषि ने भोलेनाथ से वर मांगा कि यदि कोई भी व्यक्ति इस स्थान पर उनके द्वारा पूजित शिवलिंग की पूर्ण आस्था के साथ आराधना करेगा, उसे मनवांछित फल प्राप्त हो। भोलेनाथ ने उनकी प्रार्थना को शिरोधार्य कर तथास्तु कहा। एक अन्य जनश्रुति अनुसार इस स्थान के प्राचीन शिवलिंग की खोज स्वामी ओंकारानंद गिरि महाराज 1008 ने की थी…
उत्तर भारत हिमालय की गोद में स्थित हिमाचल प्रदेश की देवभूमि ऋषि-मुनियों, साधु-संतों व तपस्वियों की धरा रही है, जोकि वास्तव में विश्व के मानचित्र पर अंकित है। इस भूमि में अनेकों प्राचीन पर्यटन-धार्मिक स्थल हैं, जो अपनी विशेषता व महत्ता के लिए प्रचलित हैं। इसलिए वर्ष भर देश-विदेश के सैलानियों का इस राज्य में हुजूम उमड़ा रहता है।
इसी श्रृखंला में हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना के समस्त क्षेत्र को प्रकृति ने अपार सौंदर्य से संवारा व नवाजा ही नहीं, अपितु यहां के लोगों ने भी वास्तुकला की विलक्षण शैलियों द्वारा मंदिरों का निर्माण कर ऊना जनपथ को अद्भुत समृद्ध धार्मिक सांस्कृतिक मूल्यों से सराबोर कर रखा है। यहां के विविध भागों में देवी-देवताओं के अनेक मंदिर विद्यमान हैं। यह सभी धार्मिक स्थल जहां अति पूजनीय व अतुलनीय हैं, वहीं लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास के प्रतिबिंब भी हैं।
यानी प्रत्येक की अपनी ही धार्मिक पहचान तथा महत्ता है। इन मंदिरों में वर्षभर अनेकों धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। ऊना के अलग-अलग शोभायमान अनेक मंदिरों में से सदाशिव ध्यंूसर महादेव मंदिर, जोकि ऊना-अंब राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे बडूही मार्ग से मात्र 12 किमी. की दूरी पर तलमेडा-बही ग्रामीण क्षेत्र की पर्वतीय भाग की तलहटी के हरे-भरे जंगल के मध्य अवस्थित है, जिसकी नक्काशी को देखकर लोग अचंभित हो जाते हैं। वैसे भी भोलेनाथ अनंत और सर्वव्यापक हैं, जिनकी महिमा अपरंपार है। किंवदंतियों अनुसार यह मंदिर लगभग 5500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह मंदिर धार्मिक व पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यधिक महत्त्व रखता है।
किंवदंतियों के अनुसार इस स्थान पर पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहां भी गुजारा था, जिसके प्रमाण प्रत्यक्ष रूप में सुरंगों, गुफा, कुंड, बावड़ीयों आदि के रूप में मिलते हैं। जनश्रुति अनुसार पांडवों के पुरोहित धौम्य ऋषि ने अपनी तीर्थ यात्रा के समय शिव की घोर अराधना की थी। भोलेनाथ ने उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें मनवांछित वर मांगने को कहा।
धौम्य ऋषि ने भोलेनाथ से कहा कि कोई भी व्यक्ति इस स्थान पर उनके द्वारा पूजित शिवलिंग की पूर्ण आस्था के साथ आराधना करेगा, तो वह मनवांछित फल प्राप्त करेगा। भोलेनाथ ने उनकी प्रार्थना को शिरोधार्य कर तथास्तु कहा। एक अन्य जनश्रुति अनुसार इस स्थान के प्राचीन शिवलिंग की खोज स्वामी ओंकारानंद गिरि महाराज 1008 ने की थी। उन्होंने यहां पहुंचकर मंदिर की पुनस्र्थापना की।
मंदिर निर्माण के दौरान खुदाई में यहां कई मूर्तियां तथा कलश चक्र आदि मिले थे। लोग इन्हें पांडवों द्वारा निर्मित मानते हैं। वैसे भी मंदिर की समस्त तलहटी ही शिवलिंग का आकार रूप लिए हुए है। मंदिर के भित्ति अवस्थित अलौकिक व भव्य शिवलिंग के दर्शन किए जा सकते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त हृदय तल से पूजा करे तो उसकी सभी मनवांछित मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हंै।
सावन माह में भोलेनाथ के दीदार करने दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का, विशेषकर हिमाचल प्रदेश से सटे पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर आदि से भक्तों का उमड़ता महासैलाब तो देखते ही बनता है। इस मौके पर श्रद्धालु अपने-अपने स्तर पर जहां भंडारे का आयोजन करते हैं, वहीं रात्रि के समय भव्य जागरण, जिसकी प्रस्तुति नामी-गिरामी कलाकार अपनी सुरम्यी आवाज व कर्णप्रिय संगीत द्वारा उपस्थित लोगों को आनंदित कर देते हैं। इस दौरान समस्त सावन माह में यह क्षेत्र भक्ति सागर में डूब जाता है। सावन माह में पंजाब से आए श्रद्धालु जब हू-ब-हू बर्फ से लकदक विशाल शिवलिंग बनाते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे भक्तजन अलौकिक शिवलिंग के साक्षात दिव्य दर्शन कर आत्मिक शांति प्राप्त कर रहे हों।
समस्त सावन मास में यह मंदिर प्रतिदिन बारिश की बूंदों की फुहारों से अटा रहता है। मंदिर के समीप ही प्राकृतिक जल स्त्रोत की अनेक बावड़ीयां भी हैं, जिनमें कुदरती निकलती निर्मल जल धारा सभी को आकर्षित करती हैं। श्रद्धालु शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर विल्व पत्र, दूर्वा, तिल,चावल, दूध व जल आदि अर्पित कर अपनी असीम आस्था में समाहित हो जाते हैं और भजनकीर्तन द्वारा शिवजी की स्तुति के माध्यम से समस्त क्षेत्र को शिवमय से गुंजायमान और सराबोर कर देते हैं।
रात्रि के समय मंदिर की बाहरी और भित्ति चमचमाती तथा टिमटिमाती रोशनी भक्तजनों को अत्यधिक प्रफुल्लित कर देती हैं और इस दौरान यह समस्त क्षेत्र इसकी जगमगाती दिव्य रोशनी से प्रकाशमान हो जाता है। इस दौरान ऐसा लगता है कि जैसे भोलेनाथ की अगाध कृपा यहां अपरंपार उन पर बरस रही हो और शिव शंकर स्वयं विचरण कर अपने भक्तों के ऊपर असीम कृपा की वर्षा कर रहे हों।
शिवरात्रि व भाद्र मास के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें स्थानीय लोगों के अलावा दूरदराज से आए लोग जहां चहलकदमी करते नजर आते हैं। यहां ठहरने के लिए सभी सुविधाओं से सुसज्जित धर्मशाला भी है और दिन-रात में सभी पधारे हुए लोगों के लिए लंगर की भी उचित व्यवस्था है और इसमें बाहर से आए भक्त भी अपनी श्रद्धानुसार भंडारे के स्टॉल लगाकर अपनी आत्मीयता से योगदान देते चले आ रहे हैं।
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