गढ़ माता मंदिर : कांगड़ा का प्राचीन भयभंजनी गढ़ माता मंदिर, जहां तीन पिंडी रूपों में विराजती हैं देवी मां

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। यहां के मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास, संस्कृति, लोकपरंपराओं और प्रकृति के अद्भुत समन्वय के भी प्रतीक हैं। कांगड़ा जिले के परौर गांव के समीप गढ़ धार की ऊंची पहाड़ी पर स्थित प्राचीन श्री देवी भयभंजनी गढ़ माता मंदिर इसी गौरवशाली परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। लगभग 1368 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह प्राचीन शक्तिस्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने के साथ-साथ इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का दुर्लभ अनुभव भी कराता है। घने देवदार और मिश्रित वनों से घिरे इस मंदिर तक पहुंचते ही वातावरण में एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति होती है। स्था
नीय परंपराओं और जनश्रुतियों के अनुसार इस मंदिर का संबंध कांगड़ा के गौरवशाली कटोच राजवंश से माना जाता है। कहा जाता है कि राजा संसार चंद अथवा उनके पूर्वजों ने यहां स्थित ऐतिहासिक गढ़ के साथ इस मंदिर का निर्माण कराया था। यद्यपि इसके निर्माण की सटीक तिथि उपलब्ध नहीं है, किंतु स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर और इसके समीप स्थित किला लगभग पांच सौ वर्ष या उससे भी अधिक पुराना है।
मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान यहां विराजमान मां भयभंजनी के तीन पिंडी स्वरूप हैं। हिमालयी शक्ति उपासना की परंपरा में पिंडी स्वरूप का विशेष महत्त्व है। श्रद्धालु देवी को भय, संकट और विपत्तियों का नाश करने वाली शक्ति के रूप में पूजते हैं। मुख्य मंदिर के निकट स्थित प्राचीन काली माता मंदिर भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है, जहां देवी पिंडी रूप में विराजमान हैं।
गढ़ माता मंदिर के समीप स्थित ऐतिहासिक किला इस क्षेत्र की प्राचीन सामरिक व्यवस्था की याद दिलाता है। पुरातात्त्विक अभिलेखों में इसे ‘पठियार फोर्ट’ के नाम से भी उल्लेखित किया गया है। प्राकृतिक आपदाओं और समय के प्रभाव से आज इसका अधिकांश भाग क्षतिग्रस्त हो चुका है, फिर भी इसकी प्राचीरें, प्राचीन कुआं तथा अन्य अवशेष अतीत की गौरवगाथा को आज भी जीवित रखते हैं।
यदि इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए तो यह धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ विरासत पर्यटन का भी महत्त्पूर्ण केंद्र बन सकता है। समय के साथ इस मंदिर तक पहुंचने की सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कभी श्रद्धालुओं को दुर्गम पगडंडियों और कठिन चढ़ाई से होकर यहां पहुंचना पड़ता था, जबकि आज परौर से लगभग पांच किलोमीटर लंबी सडक़ सीधे मंदिर तक जाती है। इससे न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं, बल्कि देश के विभिन्न भागों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह स्थल सहज रूप से सुलभ हो गया है। प्रत्येक वर्ष 15 जून से 15 जुलाई, लोक आस्था और सामुदायिक सहभागिता से यह आयोजन सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का सशक्त माध्यम बन जाता है।
हालांकि मैं अभी जुलाई महीने के आखिरी सप्ताह में मंदिर गया था, तो मेले की वजह से वहां फैले कूड़े-कचरे के ढेरों को देखकर दुख भी हुआ। आज जब धार्मिक पर्यटन देश की अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार का महत्त्वपूर्ण आधार बन रहा है, तब गढ़ माता मंदिर जैसे कम चर्चित किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थलों के समग्र विकास की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
यदि मंदिर परिसर, ऐतिहासिक किले, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय लोकसंस्कृति को एक समेकित योजना के अंतर्गत विकसित किया जाए, तो यह स्थल कांगड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन का प्रमुख आकर्षण बन सकता है। गढ़ माता मंदिर केवल श्रद्धा का स्थान नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और प्रकृति के प्रति भारतीय संवेदनशीलता का सजीव प्रतीक है।
यहां पहुंचकर यह सहज अनुभव होता है कि जहां आस्था इतिहास से मिलती है और प्रकृति अध्यात्म का आलोक बिखेरती है, वहीं से किसी सभ्यता की वास्तविक पहचान निर्मित होती है। ऐसे पवित्र स्थलों का संरक्षण और संवर्धन हमारी साझा सांस्कृतिक जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढिय़ां भी इस अमूल्य धरोहर से प्रेरणा प्राप्त करती रहें।
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