‘कल जेन अल्फा, बीटा भी आएगी’… छात्रों पर केस वापसी' को लेकर SC में बहस, CJI सूर्यकांत बोले- युवाओं को समझाने की जरूरत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को किसी राजनीतिक फैसले के आधार पर वापस लिया जाता है तो यह भविष्य के आंदोलनों के लिए गलत उदाहरण बन सकता है।
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि हाल के छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा से जुड़े मामलों को केवल राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस न लिया जाए। याचिकाकर्ता ने कहा कि इससे आने वाली पीढ़ियों में भी गलत संदेश जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने इस मामले को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मामलों के साथ जोड़ दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने उठाई आयोजकों की जवाबदेही की मांग
याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं के लिए आयोजकों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन मंत्री और पुलिस की जवाबदेही को लेकर था, लेकिन आयोजकों की भूमिका पर भी सवाल उठना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ आयोजक मीडिया प्लेटफॉर्म पर जाकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और स्थिति को शांत करने के बजाय तनाव बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार किसी भी प्रदर्शन या सभा के दौरान अप्रिय घटना होने पर आयोजकों की जिम्मेदारी तय की जाती है।
वकील ने इशारा करते हुए कहा कि यह प्रदर्शन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर से NEET-UG 2026 पेपर लीक के विरोध में किया गया था।
“कल जेनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा भी आएगी”
रिजवान अहमद ने दलील दी कि अगर प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वालों को केवल सरकार के फैसले के आधार पर राहत दी गई तो यह भविष्य में गलत मिसाल बन जाएगी।
उन्होंने कहा कि कल दूसरी पीढ़ियां भी इसी तरह के आंदोलनों का रास्ता अपना सकती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर संसद की सुरक्षा को चुनौती देने वाली बड़ी भीड़ पहुंच जाए तो गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
हालांकि, वकील ने स्पष्ट किया कि वह छात्रों को कड़ी सजा देने की मांग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नाबालिग छात्रों से सामुदायिक सेवा जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं, लेकिन पत्थरबाजी और हिंसा करने वालों को केवल किसी प्रशासनिक गलती के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सीजेआई सूर्यकांत बोले- युवाओं की बात सुनना जरूरी
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि युवा हैं और उन्हें सलाह व मार्गदर्शन की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि ताकतवर राज्य की ओर से अत्यधिक आक्रामक कार्रवाई स्थिति को और बिगाड़ सकती है।
सीजेआई ने कहा कि हालात को बेहद सावधानी से संभालना होगा। युवाओं को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि उनकी बात सुनी जा रही है। उन्होंने पुलिस को भी संयम बरतने की सलाह दी, ताकि कोई घटना होने पर स्थिति नियंत्रण से बाहर न जाए।
उन्होंने कहा कि सबसे बेहतर तरीका यही है कि युवाओं को समझाया जाए और उन्हें भरोसा दिलाया जाए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी बात सुनने के लिए तैयार है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले को पहले से लंबित अन्य संबंधित मामलों के साथ जोड़ दिया।
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