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'20 साल बाद मेट्रो में टकरा गई मेरा पहला प्यार', दिल छूने वाली है सौरव-निशा की LOVE STORY

'20 साल बाद मेट्रो में टकरा गई मेरा पहला प्यार', दिल छूने वाली है सौरव-निशा की LOVE STORY



स रोज सौरव हड़बड़ी में था, देर से नींद खुलने से सारा रूटीन गड़बड़ाया था. जल्दी-जल्दी नहाया-धोया. चाय-नाश्ता बनाने में देर हो जाएगी, इसलिए चलो मेट्रो पकड़ने से पहले चौक पर गणेश कचौड़ी वाले के यहां ही भूख मिटा लिया जाएगा.


कचौड़ी खा लूंगा तो पेट में कुछ देर टिकेगा भी. फटाक से हर रोज की तरह सौरव टिप-टॉप हुआ है लैपटॉप बैग उठाकर ऑफिस के लिए निकल पड़ा. बाहर निकलते ही कमरे को लॉक करने के लिए चाबी तलाशने लगा. फिर दोबारा कमरे में गया तो दो तीन मिनट की मशक्कत के बाद चाबी मिली और वह वहां से यही सोचते हुए निकला कि यार जिस दिन जल्दी कि सोचो तो कुछ ना कुछ अड़चन आ ही जाती है.

हाथों में गरमा-गरम कचौड़ी की प्लेट आते ही मन में दो बातें चल रही थी. पहली तो ये कि ये सोंधी खुशबू वाले नाश्ते को आराम-आराम से पूरा स्वाद लेकर खाऊं, लेकिन अगले ही पल दिमाग सिग्नल दे रहा था कि जल्दी खा लो, वरना मेट्रो में भीड़ बढ़ जाएगी. इसी ऊहापोह में जैसे-तैसे दो कचौड़ी खाकर मन को तृप्त किया और मेट्रो स्टेशन में दाखिल हो गया. ऑफिस के लिए सौरव को रमेश नगर तक जाना होता है, 15 स्टेशन के इस रास्ते में उसकी कोशिश रहती है कि सीट मिल जाए ताकि यात्रा बढ़िया कट जाए. सीट की लालच में सौरव अक्सर मेट्रो के आखिरी कोच में सवार होता है. उस रोज भी आइडिया काम आया और सीट पर बैठने का मौका मिल गया.

सौरव अभी अपनी सीट पर थोड़ा कम्फर्ट भी नहीं हुआ था कि गेट के बाद वाली सीट पर एक लड़की पर नजर गई. देखते ही दिमाग ने सिग्नल दिया कि ये तो अपनी निशा जैसी लग रही है. फिर थोड़ा ध्यान देकर देखा तो मन में दुविधा हो गई. अरे नहीं, बस इसका लुक उसकी तरह लग रहा है. वो कितनी दुबली पतली थी, ये तो कसे हुए बदन की है. नहीं, नहीं ये वो नहीं है.

फिर ख्याल आया कि चलो उसे देखते रहते हैं, अगर उसकी भी नजर पड़ी और उसने पहचान लिया तो बात क्लियर हो जाएगी. वरना हो सकता है आंखें धोखा खा रही होगी. अब सौरव एक टक से उस लड़की को देखने लगा. कुछ ही पल हुए होंगे कि दोनों की नजरें मिली. नजर मिलते ही सौरव के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई, उसे लगा ये निशा ही है और वो उसे पहचान लेगी. लेकिन उस लड़की का हाव-भाव अनजाना सा रहा. यह देख सौरव की मुस्कान हल्की मायूसी में बदल गई.


यह तस्वीर AI जेनरेटेड है.

वह यही सोच रहा था, बेकार में उस लड़की का लुक देखकर उसे निशा समझ बैठा. तभी उसके दिमाग ने फिर से यही कहा कि अरे नहीं, ये तो निशा ही है, मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकती है. मुझे उससे अलग हुए भी तो 20 साल बीत चुके हैं. अब वो शादीशुदा लग रही है. साथ में शायद उसका हसबैंड और तकरीबन तीन साढ़े तीन साल का बेटा भी है.

शादी के बाद तो लड़कियों की बॉडी हार्मोनल चेंज की वजह से थोड़ी कस ही जाती है. अरे इसका हेयर स्टाइल भी चेंज है. तब वो गर्दन तक का बाल रखती थी, इसके तो बड़े बाल हैं. ये कौन सी बात है, बाल तो अपने घर की खेती है जब चाहो छोटे कर लो, जब मन करे बड़े. अगर ये एक कदम चल ले तो मैं कंफर्म हो जाउंगा कि ये निशा ही है. लेकिन मेट्रो में ये कैसे हो सकता है, वो तो सीट पर बैठी है, जब उठेगी तब तो मेट्रो के बाहर जा चुकी होगी. कैसे पता करूं कि ये निशा ही है या कोई उसकी जैसी दूसरी.

मन में यही सब बातें चल रही थी, तब तक बाराखंभा स्टेशन आ चुका था. फिर लगा कि कहीं ये राजीव चौक पर उतर ना जाए, क्योंकि ज्यादातर यात्री वहां से येलो लाइन के लिए इंटरचेंज करते हैं. इतनी देर के ऑब्जर्वेशन से एक बात तो कंफर्म हो चुकी थी कि वो सुबह-सुबह ट्रेन से शायद आनंद विहार टर्मिनल में उतरी थी और मेट्रो से अपने दिल्ली वाले आशियाने में जा रही थी. उसके पास एक बड़ी ट्रॉली बैग, हैंड बैग था, जिसे उसके हसबैंड ने संभाल रखा था. वहीं वो लड़की एक कपड़े का झोला (थैला) लिए हुई थी, जिसे देखकर ही समझ में आ रहा था कि उसमें ट्रेन की यात्रा के लिए भोजन-पानी लाया गया होगा.

इतना कुछ समझने के बाद एक बात की पुष्टी तो हो गई थी कि ये कोलकाता वाले रूट से आ रही है. क्योंकि आनंद विहार में ज्यादातर बिहार और बंगाल जाने वाली ट्रेनों का ही ठहराव होता है. सौरव ने फटाफट से आईआरसीटीसी ऐप ओपन किया तो देखा कि ये तो विक्रमशिला एक्सप्रेस के आनंद विहार आने की टाइमिंग है. इस बात से मन में थोड़ा उत्साह बढ़ा क्योंकि ये पक्का हो गया था कि ये निशा की तरह लग रही लड़की भागलपुर से आ रही है. इतना कुछ सोचते-सोचते मेट्रो राजीव चौक स्टेशन से आगे आरके आश्रम मार्ग पहुंच चुकी थी. मन में एक संतोष हुआ कि ये निशा है या नहीं, ये पता करने का थोड़ा और वक्त मिल गया, लेकिन ये भी डर सता रहा था कि वह कहीं अगले स्टेशन पर ही उतर ना जाए.

इन्हीं ख्यालों के साथ सौरव एक बार फिर से अपने मिशन में जुट गया. वह मन ही मन खुद को कोसने लगा कि अगर उसने पिछले 20 सालों में अगर सोशल मीडिया के जरिए भी निशा से जुड़ा रहता तो आज उसे ये परेशानी नहीं झेलनी पड़ती. अब वह उस लड़की की एक-एक हरकत को ध्यान से ऑब्जर्व करने लगा और अपनी पहली क्लोज दोस्त/गर्लफ्रेंड निशा से तुलना करने लगा-:

अरे निशा तो बड़े सलीके से बैठती थी, उसके सलवार-सूट में तनिक भी सिलवटें नहीं आती थी. उसकी एक आदत थी बार-बार अपने कान के पास के बालों को सवारने की. कैंटीन में जब कुर्सी पर बैठती तो कुछ-कुछ देर में बायां पैर हिलाती. बोलते वक्त अनायास ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती. लेकिन इस लड़की में इनमें से एक भी बातें मैच नहीं कर रही है. इतनी देर में उसने तो अब तक केवल तीन बार अपने कानों के पास बाल को संवारती दिखी है. इतना कुछ सोचने के बाद मन मायूस होने लगा था, दिल से यही आवाज आ रही थी कि मेरी आंखें धोखा खा रही हैं.

तभी लड़की के साथ मौजूद बच्चा नटखटपन में मेट्रो के गेट के पास चला गया. लड़की ने उसे इशारे से बुलाया, लेकिन वो नहीं आया तब वो उसे लाने के लिए अपनी सीट से उठकर दो कदम चली होगी. यह देखते ही सौरव कंफर्म हो गया कि ये उसकी ही निशा है. कॉलेज में ना जाने उसने निशा के साथ सैंकड़ो घंटे कदमताल किए होंगे, कभी एक क्लास से दूसरे क्लास में जाने के लिए तो कभी कैंटीन या भागलपुर में अलग-अलग ठिकानों पर. दोनों रेलवे स्टेशन की तरफ और सुजागंज बाजार की गलियों में काफी घूमा फिरा करते थे. इसलिए वह निशा की चाल को लेकर पूरे आत्मविश्वास में था.

अब सौरव के सामने चुनौती यह थी कि वह उस लड़की से डायरेक्ट कैसे बात करे. क्योंकि उसके साथ उसका पति और बच्चा भी था. यही सोच रहा था कि अगर वह उसके पास गया और वो निशा नहीं निकली तो बखेड़ा खड़ा हो सकता है. आज के जमाने में लोग वैसे ही झट से छेड़छाड़ या बदतमीजी का आरोप लगा देते हैं. अगर उसके साथ ऐसा कुछ हुआ तो उसकी क्या इज्जत रह जाएगी. वह हर रोज इसी रूट पर मेट्रो में यात्रा करता है. यही सब सोचते-सोचते कीर्ति नगर स्टेशन आने का अनाउंसमेंट हुआ, तभी वो लड़की और उसके हसबैंड सामान समेटकर गेट के पास पहुंच गए.

अब सौरव को समझ में आ गया था कि ये लोग इसी स्टेशन पर उतरने वाले हैं. पहले उसे लगा जाने दो, फिर सोचा इतने दिनों बाद उसे अपने पहले प्यार से मिलने का मौका मिला है, वह उसे कैसे जाने दे. यहीं उतर जाता हूं, उसके बाद यहां से ऑटो बुक कर ऑफिस चला जाऊंगा. कम से कम कंफर्म तो हो लूं कि ये लड़की निशा है या नहीं.

उस फैमिली के साथ सौरव भी कीर्ति नगर में ही उतर गया. उतरते ही उसने हिम्मत जुटाई और पीछे से आवाज दे दी, 'निशा'. वो लड़की और उसके हसबैंड यह आवाज सुनते ही वहीं ठिठक गए. दोनों ने पीछे मुड़कर देखा तो एक लड़का सुकचाया हुआ लेकिन चेहरे पर एक मुस्कान लिए उसकी तरफ देख रहा है. देखते ही वो लड़की बोल पड़ी अरे सौरव तुम यहां. इतना सुनते ही सौरव की बांछें खिल उठी. मेट्रो की उतरी हुई सारी भीड़ एग्जिट गेट की तरफ बढ़ गई थी, लेकिन सौरव, निशा, उसका पति और बच्चा वहीं रुक गए.


यह तस्वीर AI जेनरेटेड है.

निशा और सौरव ने पहले बेहद गर्मजोशी के साथ हाय हैलो किया. यूं कहें कि निशा शायद भूल गई कि उसका पति उसके साथ है. पल भर के लिए वो 20 साल पीछे की जिंदगी में लौट गई थी. वह झट से सौरव के गले लग गई और उसे एक मुक्का मारते हुए बोली, अरे तू इतने दिनों से कहां था, तेरी कोई खोज खबर ही नहीं थी. कॉलेज के दोस्तों में भी किसी को पता नहीं था कि तू कहां है क्या कर रहा है. बगल में खड़े होकर निशा का पति ये सारी बातें देख रहा था. तब जाकर उसने अपने पति अमित का सौरव से परिचय कराया. बोली भागलुपर कॉलेज में हमने तीन साल साथ पढ़ाई की है. हम अच्छे दोस्त थे. ग्रेजुएशन के बाद सौरव कोई कोर्स करने के लिए दिल्ली आ गया था. उस जमाने में फोन या मोबाइल कॉलिंग इतनी महंगी थी कि हमारा लिंक टूट गया. इसके पापा का भी पटना ट्रांसफर हो गया था सो…

बीच में रोकते हुए सौरव बोला- मैं तुम्हें लक्ष्मी नगर से ही मेट्रो में देख रहा था, लेकिन कंफ्यूज था कि तुम निशा हो या नहीं. तुमने मेरी तरफ देखा लेकिन तुम्हारा कोई रिएक्शन नहीं आया (तभी निशा बोली, अरे नहीं यार मैंने तुम्हें देखा ही नहीं था.)

सौरव और अमित में जान पहचान हुई. निशा ने पूछा तूने शादी कर ली.

सौरव- अभी कहां यार

निशा- शादी करेगा भी या नहीं? (बीच में टोकते हुए अमित बोल पड़ा, ऐसी बातें यहां क्यों पूछ रही हो, उनका अपना कुछ पर्सनल होगा)

सौरव- अरे अमित जी निशा के लिए मेरा क्या ही पर्सनल. हम भले ही इतने दिनों बाद मिले हैं, लेकिन कॉलेज में हमारा गैंग हुआ करता था. दरअसल, बात ये है कि शुरुआती साल गर्वमेंट जॉब की प्रिप्रेशन में निकल गए. एक दो रिजल्ट हुआ भी, लेकिन उसक स्केल ठीक नहीं था इसलिए ज्वाइन नहीं किया. बाद में एमबीए किया फिर देर से प्राइवेट जॉब शुरू हुई. शुरुआत में सोचा इतनी सैलरी हो जाए कि दो लोगों का खर्च चल सके. इस बीच घर में कुछ ऐसी दुखद घटनाएं हो गई जिसके चलते एक दो साल उसमें निकल गए. हालांकि घर वाले रिश्ते को लेकर बात कर रहे हैं, उम्मीद है इस साल के अंत तक शादी हो जाएगी. चल मेरी छोड़ तुम बताओ, दिल्ली में क्या कर रही हो?

निशा- अमित यहीं जनकपुरी वाले पीएनबी (पंजाब नेशनल बैंक) में मैनेजर हैं. 2020 कोरोना के टाइम हमारी शादी हुई थी. कुछ साल तो मैं वहीं भागलपुर में ही सास-ससुर के साथ रही, लेकिन करीब ढाई साल से यहीं रह रहे हैं. ये बातें चल ही रही थी कि सौरव को याद आया कि उसे ऑफिस पहुंचने में देर हुई तो उसका हॉफ टाइम लग जाएगा. उसने तुरंत बीच में ही बात रोकी और ऑफिस टाइमिंग की बात बताई. निशा और सौरव ने एक दूसरे से नंबर एक्सचेंज किया और आगे भी बातचीत जारी रखने के वादे के साथ दोनों अपनी-अपनी राह चल पड़े. वहीं अमित ने सौरव को किसी संडे को घर पर लंच पर आने का आमंत्रण भी दिया.

निशा से मुलाकात के बाद तो सौरव का मानो दिन ही बन गया. वह कीर्ति नगर मेट्रो स्टेशन से रमेश नगर स्थित अपने ऑफिस के लिए ऑटो बुक किया और निकल पड़ा. पूरे रास्ते वह अपनी 20 साल पुरानी जिंदगी के बारे में ही सोच-सोचकर मन ही मन मुस्कुराता रहा. हालांकि निशा की शादी हो चुकी थी इसलिए ऑफिस पहुंचने तक उसने अपनी पुरानी इच्छाओं में आए उबाल को दफन कर रोज की तरह काम में जुट गया.

नोट: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है, इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. यदि किसी व्यक्ति, स्थान, घटना या संस्था से इसकी कोई समानता पाई जाती है, तो इसे मात्र एक संयोग माना जाएगा.

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