खतरे की घंटी: साल 2100 तक 40% धरती बन जाएगी रेगिस्तान! इंसानों के साथ पेड़-पौधे भी हो जाएंगे खत्म.

हमारी धरती लगातार गर्म हो रही है और इसका नतीजा बेहद भयानक होने वाला है. बढ़ते तापमान के कारण दुनिया के कई इलाके तेजी से सूख रहे हैं. जब ऐसा होता है तो सूखे इलाकों की सीमाएं आगे बढ़ने लगती हैं.
इससे पूरी दुनिया का लैंडस्केप बदल जाता है और पेड़-पौधे खत्म होने लगते हैं. अब साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर एक खतरनाक अलर्ट जारी किया है. एक नई रिसर्च के मुताबिक 21वीं सदी के अंत तक धरती का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ड्राईलैंड्स बन सकता है.
'एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स' में पब्लिश एक रिपोर्ट में यह डरावना दावा किया गया है. हालांकि इस रिसर्च में एक हैरान करने वाली बात भी सामने आई है. क्लाइमेट चेंज के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) इस खतरे को थोड़ा धीमा कर रही है. आइए इस डरावनी रिसर्च को डिटेल में समझते हैं.
धरती पर ड्राईलैंड्स बढ़ने का कारण क्या है?
ड्राईलैंड्स उन इलाकों को कहते हैं जहां पानी की भारी कमी होती है. यहां बारिश बहुत कम होती है और वाष्पीकरण के जरिए पानी ज्यादा उड़ जाता है. साइंटिस्ट्स का मानना है कि दुनिया भर में ड्राईलैंड्स लगातार बढ़ रहे हैं.
चाइनीज एकेडमी ऑफ फॉरेस्ट्री के साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर गहराई से एनालिसिस किया है. उन्होंने दुनिया भर के क्लाइमेट डेटा और भविष्य के अनुमानों का इस्तेमाल किया. इसके लिए 1960 से 2023 तक का मौसम डेटा देखा गया. टीम ने एक नई तकनीक का इस्तेमाल करके यह पूरा डेटा तैयार किया है.
रिसर्च टीम के एक साइंटिस्ट ने कहा, 'सूखे इलाकों का बढ़ना ग्लोबल सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए बड़ा खतरा है'.
अगर सूखे इलाके उन जगहों पर फैलेंगे जहां अभी अच्छी नमी है, तो पानी की कमी और गंभीर हो जाएगी. इससे पूरे इकोसिस्टम को भारी नुकसान पहुंचेगा और रेगिस्तान तेजी से बढ़ने लगेंगे. इंसान और जानवरों के लिए पानी जुटाना भी काफी मुश्किल हो जाएगा.

1994-2023 के दौरान दुनिया भर के शुष्क क्षेत्रों और उनसे जुड़े जलवायु क्षेत्रों का भौगोलिक वितरण (a); हर जलवायु क्षेत्र का प्रतिशत (b). (Visuals Credit : Cai et al., Environmental Research Letters, 2026)
कार्बन डाइऑक्साइड गैस इस खतरे को धीमा कैसे कर रही है?
- इस रिसर्च में सबसे हैरान करने वाली बात कार्बन डाइऑक्साइड गैस को लेकर है. हम सभी जानते हैं कि यह गैस ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बड़ा कारण है. लेकिन यही गैस धरती को पूरी तरह सूखने से थोड़ा बचा भी रही है.
- दरअसल वातावरण में जब CO2 का लेवल बढ़ता है तो इसका असर पौधों पर पड़ता है. पौधों की पत्तियों में छोटे छेद होते हैं जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है. ज्यादा CO2 होने पर यह स्टोमेटा पूरी तरह नहीं खुलते हैं. इससे पौधों के अंदर का पानी भाप बनकर कम उड़ता है. इस वजह से पेड़-पौधे लंबे समय तक अपने अंदर पानी बचाकर रख पाते हैं.
- स्टोमेटा के आंशिक रूप से बंद होने के कारण पानी का नुकसान काफी कम हो जाता है. साइंटिस्ट्स का कहना है कि पुरानी रिसर्च में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया था. पुराने क्लाइमेट मॉडल में इस खास फैक्टर को इग्नोर कर दिया गया था. इसीलिए पहले की कुछ रिपोर्ट्स में 2100 तक 56 प्रतिशत धरती के सूखने का दावा किया गया था. लेकिन नई कैलकुलेशन के बाद इसे करीब 40 प्रतिशत माना गया है.
फिलहाल धरती के कितने हिस्से पर मौजूद है सूखा और बंजर इलाका?
रिसर्च टीम ने 1994 से 2023 के बेसलाइन डेटा के आधार पर नई जानकारी दी है. अंटार्कटिका को छोड़कर फिलहाल धरती का करीब 38.58 प्रतिशत हिस्सा ड्राईलैंड्स है. इन सूखे इलाकों को चार अलग-अलग कैटिगरी में बांटा गया है.
- सबसे ज्यादा 14.72 प्रतिशत हिस्सा सेमी-एरिड जोन में आता है.
- इसके बाद एरिड जोन आते हैं जो धरती के 11.24 प्रतिशत हिस्से पर हैं. यह इलाके मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया और चीन के बड़े हिस्से में फैले हुए हैं.
- वहीं चीन और रूस में ड्राई सब-ह्यूमिड जोन का बड़ा हिस्सा मौजूद है. इसका कवरेज पूरी दुनिया के लैंड एरिया का करीब 6.35 प्रतिशत है.
- इसके अलावा अल्जीरिया, लीबिया और सऊदी अरब जैसे देशों में हाइपर-एरिड जोन हैं. यह बेहद खतरनाक सूखे इलाके हैं जो 6.27 प्रतिशत हिस्से में फैले हैं.
यह आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही पानी की भारी कमी से जूझ रहा है.
सदी के अंत तक दुनिया के किन देशों पर टूटेगा सबसे ज्यादा कहर?
भविष्य को लेकर साइंटिस्ट्स की चेतावनी बहुत डराने वाली है. साल 2071 से 2100 के बीच ग्लोबल ड्राईलैंड्स का कवरेज 39.31 से 40.28 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. यह आंकड़ा मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में ग्रीनहाउस गैसों का एमिशन कितना होता है. सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हाइपर-एरिड जोन में देखने को मिलेगी.
इसका मतलब है कि धरती पर अल्जीरिया के आकार जितना नया रेगिस्तान बन जाएगा. यह दायरा ऑस्ट्रेलिया के कुल आकार का लगभग 30 प्रतिशत बैठता है. अगर ऑस्ट्रेलिया की बात करें तो यह दुनिया का सबसे सूखा महाद्वीप है. भविष्य में आने वाले इस भयानक खतरे का सबसे बुरा असर ऑस्ट्रेलिया पर ही पड़ेगा.
रिसर्च के मुताबिक इस सदी के अंत तक ऑस्ट्रेलिया के लैंडस्केप में काफी बड़े बदलाव आएंगे. इसके बाद ब्राजील का नंबर आता है जहां भयानक सूखे का अलर्ट जारी किया गया है. अफ्रीका के भी कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर मौसम के बदलाव देखने को मिलेंगे.
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