Brics vs Tariff : ट्रंप के सबसे बड़े हथियार पर ब्रिक्स ने साधा निशाना, कहा- ये विकासशील देशों के खिलाफ भेदभाव

नई दिल्ली. भारत की अगुवाई में चल रहे ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में शनिवार को एक साझा घोषणापत्र जारी किया गया. इसमें सभी ब्रिक्स देशों ने एक स्वर में टैरिफ और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का विरोध किया.
अपने साझा घोषणापत्र में ब्रिक्स ने कहा कि विकसित देशों की ओर से लगाए जा रहे एकतरफा टैरिफ और व्यापार को सीमित करने वाले उपाय विकासशील देशों के साथ भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी व्यवहार हैं. यह कदम विश्व व्यापार संगठन के नियमों के भी खिलाफ हैं.
ब्रिक्स की यह घोषणा टैरिफ और व्यापार को लेकर दुनिया में चल रहे तनाव के बीच में जारी की गई है. इसमें कहा गया कि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं घरेलू उद्योगों को बचाने और अपने आर्थिक व रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए टैरिफ और अन्य व्यापारिक उपायों का तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं. हाल के वर्षों में अमेरिका ने कई व्यापारिक साझेदारों से होने वाले आयात पर भारी भरकम टैरिफ लगा दिया है. इसके बाद दूसरे देशों ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी. इससे ग्लोबल सप्लाई चेन व नियमों पर आधारित व्यापार प्रणाली में रुकावट आने की चिंताएं पैदा हो गई हैं.
सीबीएएम पर भी साधा निशाना
ब्रिक्स ने यूरोपियन यूनियन के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) ने स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, फर्टिलाइजर, बिजली और हाइड्रोजन जैसे सेक्टर में आयात पर कार्बन से जुड़ी कॉस्ट को भी शामिल करने का विरोध किया है. इस मैकेनिज्म का मकसद कार्बन लीकेज को रोकना और यह पक्का करना है कि इंपोर्ट किए गए सामान पर भी वही कार्बन कीमत लगे जो ब्लॉक के अंदर प्रोडक्शन पर लगती है. विकासशील देशों ने चिंता जताई है कि ऐसे कदमों से उनके एक्सपोर्ट की लागत बढ़ सकती है और मार्केट तक पहुंच में उनके लिए रुकावटें पैदा हो सकती हैं.
टैरिफ ने डब्ल्यूटीओ के नियम तोड़े
ब्रिक्स ने कहा कि एकतरफा टैरिफ डब्ल्यूटीओ के नियमों के खिलाफ हैं. घोषणापत्र में चेतावनी दी गई कि व्यापार को सीमित करने वाले टैरिफ और नॉन टैरिफ जैसे कदमों से ग्लोबल कारोबार को गंभीर नुकसान हो रहा है. इससे सप्लाई चेन में रुकावट आएगी और विकासशील देशों के सामने व्यापार को लेकर संकट पैदा होगा. ब्रिक्स ने कहा कि हम ऐसे एकतरफा रुकावटों और भेदभाव व संरक्षणवादी उपायों का विरोध करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है. ऐसे उपाय विकासशील देशों की क्षमता को कमजोर करते हैं.
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