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Supreme Court: ग्रेच्युटी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, कर्मचारियों को तगड़ा झटका...

 

Supreme Court Decision : ग्रेच्युटी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, कर्मचारियों को तगड़ा झटका.!


 (Gratuity rules)  यदि आपने किसी कंपनी में पांच साल काम किया है, तो यह सोच लेना कि आपको ग्रेच्युटी मिल जाएगी, सही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच ग्रेच्युटी के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. कुछ मामलों में ग्रेच्युटी (gratuity) का भुगतान बिलकुल नहीं किया जाएगा. इसलिए, कर्मचारियों को ग्रेच्युटी (employees gratuity) की उम्मीद करने से पहले उन नए नियमों को समझना चाहिए, जो उनके हक पर प्रभाव डाल सकते हैं.

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 17 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने निर्णय दिया कि ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत, कर्मचारी की ग्रेच्युटी को जब्त करने के लिए अब आपराधिक सजा जरूरी नहीं है. कर्मचारी को 'नैतिक भ्रष्टाचार' (Moral Turpitude) के आधार पर निकाला जाता है, तो उसकी ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है. इसके लिए अब कोर्ट में अपराध (crime in court) साबित करने की जरूरत नहीं है. नैतिक भ्रष्टाचार का मतलब है कोई अनैतिक, गलत या धोखाधड़ी वाला काम करना या फर्जीवाड़ा करना.

2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (यूनियन ऑफ इंडिया vs. अजय बाबू) में कहा गया था कि ग्रेच्युटी रोकने के लिए अपराध साबित करना आवश्यक था. लेकिन नए फैसले के अनुसार, 2018 का निर्णय अब लागू नहीं होगा. यदि किसी कर्मचारी को नैतिक भ्रष्टाचार के आरोप में निकाला जाता है, तो कंपनी उसकी ग्रेच्युटी रोक सकती है. इससे कंपनियों को उन कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई का एक प्रभावी साधन मिल गया है.

कर्मचारी ने गलत बताई अपनी जन्मतिथि-

एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस ताजा मामले में एक कर्मचारी ने अपनी असली जन्मतिथि छुपाई थी. उसने 1953 की जगह 1960 की जन्मतिथि दिखाई थी. इस वजह से उसे 22 साल तक नौकरी मिली. जब इस झूठ का पता चला, तो उसे नौकरी से निकाल दिया गया और उसकी ग्रेच्युटी रोक ली गई. कोर्ट ने कहा कि अगर कर्मचारी ने शुरू में ही सही जन्मतिथि बताई होती, तो उसे नौकरी नहीं मिलती.

इस मामले में, एक कर्मचारी ने अपनी जन्मतिथि गलत बताकर नौकरी पाई और 22 साल तक एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में काम किया. जब यह धोखाधड़ी सामने आई, तो कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया और उसकी ग्रेच्युटी रोक दी, हालांकि उस पर कोई आपराधिक मामला नहीं चलाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस तरह की धोखाधड़ी 'नैतिक पतन' है और ग्रेच्युटी रोकने के लिए आपराधिक सजा जरूरी नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट (supreme court order) ने कहा कि नियोक्ताओं को ग्रेच्युटी रोकते (grautity holding) समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जिसका अर्थ है कि कर्मचारियों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए. कोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारी की 75% ग्रेच्युटी उसे वापस की जाए, जबकि केवल 25% राशि रोकी जा सकती है. इससे यह स्पष्ट होता है कि नियोक्ताओं को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए.

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