AI ने बदला पंचायत चुनावों का चेहरा, प्रत्याशियों ने सोशल मीडिया को प्रचार का माध्यम बनाकर पुरानी परंपरा बदली

हिमाचल के ग्रामीण लोकतंत्र की बुनियादी रीढ़ कहे जाने वाले पंचायत चुनाव अब केवल पारंपरिक नारों, दीवारों पर पेंटिंग और घर-घर जाकर हाथ जोडऩे तक सीमित नहीं रह गए हैं। इस बार के पंचायत चुनावों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने एक मूक, लेकिन सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार के रूप में प्रवेश किया है।
ग्रामीण मतदाताओं को रिझाने से लेकर मतदान केंद्रों की सुरक्षा और मतों की गिनती तक, एआई का असर हर जगह साफ देखा गया। पंचायत चुनाव के इतिहास में पहली बार तकनीक ने सीधे गांव की चौपाल पर दस्तक देकर चुनाव लडऩे और लड़ाने के पुराने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। चुनावों की शुचिता और निष्पक्षता को बनाए रखने में एआई ने इस बार सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। प्रचार के मोर्चे पर एआई का एक बेहद दिलचस्प और कुछ हद तक चिंताजनक रूप भी सामने आया। पंचायतों से पहले हुए नगर निगम चुनावों में भी उम्मीदवारों ने मतदाताओं के डेटा, जैसे उम्र, जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दों का विश्लेषण करने के लिए एआई टूल्स का सहारा लिया।
इसके जरिए माइक्रो-टारगेटिंग की गई, यानी हर विशिष्ट व्हाट्सऐप ग्रुप और क्षेत्र के लिए अलग तरह का चुनावी संदेश तैयार किया गया। जहां एक तरफ उम्मीदवार अपनी आवाज के एआई-क्लोन तैयार कर हजारों मतदाताओं को एक साथ व्यक्तिगत कॉल और वॉयस मैसेज भेज रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रतिद्वंद्वियों को बदनाम करने के लिए डीपफेक वीडियो और ऑडियो का भी जमकर दुरुपयोग हो रहा है, जिसने चुनाव आयोग और साइबर सेल की कशमकश बढ़ा रखी है।
चुनौतियां भी कम नहीं
एआई ने जहां चुनाव को आधुनिक और पारदर्शी बनाया है, वहीं इसने ग्रामीण भारत में एक नई बहस को भी जन्म दिया है। भारी-भरकम फंड वाले प्रत्याशियों ने जहां महंगे एआई टूल्स और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर बढ़त बना ली, वहीं गरीब या कम तकनीकी समझ रखने वाले उम्मीदवारों के लिए यह मुकाबला असमान्य हो गया। बहरहाल, इन पंचायत चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य का ग्रामीण लोकतंत्र अब पूरी तरह से स्मार्ट और डिजिटल होने की राह पर चल पड़ा है।
No comments