“भारत के मुसलमान खतरे में, अब गाजा और म्यांमार जैसे होने जा रहे हैं हालात!” पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब के बयान से मची खलबली.
आखिर मुसलमानों को वोटिंग और राजनीति से पीछे क्यों हट जाना चाहिए?
जब मोहम्मद अदीब से पूछा गया कि भारतीय मुसलमानों को वोट क्यों नहीं करना चाहिए, तो उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। उनका कहना है कि मुसलमानों ने राजनीति के सारे तजुर्बे करके देख लिए हैं। वे देश की हर राजनीतिक पार्टी के साथ जाकर देख चुके हैं, लेकिन पिछले दस सालों में हालात पूरी तरह बदल गए हैं। आज इस मुल्क में मुसलमानों को महज एक ‘कैटलिस्ट’ (catalyst) की शक्ल में लाकर खड़ा कर दिया गया है।
पूर्व सांसद ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि देश में आज विकास, रोजी-रोटी और रोजगार के मुद्दों पर चुनाव नहीं जीते जाते, बल्कि चुनाव सिर्फ इस बात पर जीता जाता है कि मुसलमानों को कैसे सबक सिखाना है। इसी बात पर जश्न मनाया जाता है। जब तक मुसलमान इस सियासी खेल का हिस्सा बने रहेंगे, तब तक नफरत की राजनीति बंद नहीं होगी। इसलिए देश को बचाने का अब यही एकमात्र तरीका बचा है कि मुसलमान खुद को इस चुनावी होड़ से अलग कर लें। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी अब इस तरह के बयान आने लगे हैं कि मुसलमानों ने किसी खास दल को वोट नहीं दिया।
क्या वोट न करने से छिन जाएगा मताधिकार?
इस बड़े सवाल पर कि अगर मुस्लिम समाज वोट नहीं करेगा तो क्या उनके अधिकार छिनने का खतरा नहीं बढ़ जाएगा? इस पर मोहम्मद अदीब ने जमीनी हकीकत का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि आज भी क्या बेहतर हो रहा है? सड़क पर चलते हुए, मस्जिद के अंदर या बाहर, मुसलमानों को अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है। खुद प्रधानमंत्री कपड़ों से पहचान करने की बात कह चुके हैं, यानी हमारी पहचान पहले ही विलेन के तौर पर तय कर दी गई है। देश में बुलडोजर भी सबसे ज्यादा मुसलमानों के घरों पर ही चलते हैं। हाल ही में बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद मस्जिदों के सामने बैंड बजाए गए, जिसे पुलिस और अदालतें भी देख रही हैं।
मोहम्मद अदीब ने खुलासा किया कि जब उन्होंने यह विचार रखा, तो कई मुसलमानों ने उनकी बात का समर्थन किया। लेकिन वहीं दूसरी तरफ कई गैर-मुसलमानों ने उन्हें गालियां दीं और ‘पाकिस्तान चले जाओ’ के नारे लगाए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नफरत फैलाने वाले नेताओं के अपने बच्चे तो विदेशों में जाकर वहां की नागरिकता ले रहे हैं, लेकिन निशाना सिर्फ आम मुसलमानों को बनाया जा रहा है। इसका एकमात्र समाधान यह है कि सभी विपक्षी पार्टियों को एकजुट होना होगा। अगर राजनीतिक दल मिलकर लड़ने को तैयार नहीं हैं, तो मुसलमानों को चुनाव से दूरी बना लेनी चाहिए।
म्यांमार और गाजा जैसे बन रहे हैं देश के हालात
भारत में मुस्लिम समाज की मौजूदा स्थिति पर बात करते हुए पूर्व सांसद ने बेहद डरावनी आशंका जताई। उन्होंने कहा कि भारत के मुसलमानों की हैसियत अब म्यांमार के रोहिंग्या जैसी होने जा रही है। हम अभी गाजा के फिलिस्तीनी तो नहीं बने हैं, लेकिन अगर देश की अदालतें इसी तरह खामोश रहीं और पुलिस प्रशासन में नफरत का यह माहौल बना रहा, तो वो दिन भी दूर नहीं है। भोपाल में एक मुस्लिम युवक पर हुए हमले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां आरोपी पुलिस की सुरक्षा में घूमते दिखे। अगर देश में पुलिस और अदालतें पूरी ईमानदारी से काम करें, तभी संविधान के तहत सब बराबर हो पाएंगे।
क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों पर भरोसा किया जा सकता है?
अदीब ने कांग्रेस, सपा और राजद जैसी सेकुलर कही जाने वाली पार्टियों पर भी बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज देश की हर राजनीतिक पार्टी इस डर में जी रही है कि कहीं उसका ‘हिंदू वोट बैंक’ न खिसक जाए। उन्हें पूरा यकीन है कि मुसलमान तो मजबूरी में उन्हीं को वोट देगा। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर पार्टियां मुसलमानों के मुद्दों पर चुप रहती हैं। हमारी मस्जिदों पर तलवारें लहराई जाती हैं, लेकिन कोई भी तथाकथित सेकुलर नेता सड़क पर नहीं उतरता।
मुसलमान कभी लालू, कभी मुलायम तो कभी कांग्रेस के पीछे भागता रहता है, लेकिन हाथ सिर्फ हताशा लगती है। इसी हताशा का फायदा उठाकर असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता सामने आते हैं। ओवैसी के पास कोई ठोस विकल्प नहीं है, लेकिन हताश मुस्लिम समाज उनके पीछे चलने को मजबूर हो जाता है। उन्होंने कहा कि देश का जो सेकुलर हिंदू तबका है, वह भी मुसलमानों का साथ देने के कारण चुनाव हार जाता है और देशद्रोही कहलाता है, हमें उनकी भी सुरक्षा की फिक्र करनी होगी।
राजनीति से दूर रहने पर क्या होगा फायदा?
मोहम्मद अदीब ने मुस्लिम समाज के भीतर ही कुछ कम्युनिटीज का उदाहरण देते हुए अपनी बात को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में बोहरा और खोजा जैसी छोटी-छोटी कम्युनिटीज भी हैं, जो कभी भी चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं बनतीं। यही कारण है कि वे आज सबसे ज्यादा खुशहाल और सुरक्षित हैं।
इसलिए सभी मुसलमानों को राजनीति के इस दलदल से पूरी तरह दूर हो जाना चाहिए। उन्हें सिर्फ अपनी पढ़ाई-लिखाई, व्यापार और तरक्की पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि समाज का एक ऐसा तबका जरूर है, जो मेहनत करने के बजाय सिर्फ पैसा कमाने और सत्ता के जरिए लूट-खसोट मचाने के लिए सियासत में जाना चाहता है। लेकिन एक आम मुसलमान, जो ठेला लगाकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा है, उसका इस सियासी खेल से दूर रहना ही भलाई है।

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