ना होर्मुज का रोड़ा, ना यूरेनियम का पेंच… कतर के इस महाफंड पर आकर अटकी ईरान-अमेरिका की बात

New Delhi : ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को लेकर लंबे समय से चल रही पर्दे के पीछे की बातचीत अब एक बेहद दिलचस्प और संवेदनशील मोड़ पर आकर टिक गई है। अब तक पूरी दुनिया को यह लग रहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का रणनीतिक विवाद या ईरान का तेजी से बढ़ता यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) इस डील का सबसे बड़ा रोड़ा है।
लेकिन कूटनीतिक गलियारों से आ रही ताजा रिपोर्टों ने हर किसी को चौंका दिया है। हकीकत यह है कि इस महाडील के टूटने या बनने के बीच अब कोई सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि कतर के बैंकों में जमा ईरान का एक बड़ा ‘महाफंड’ आ गया है। ईरान ने दो टूक लहजे में साफ कर दिया है कि जब तक उसे उसकी फंसी हुई अरबों की रकम वापस नहीं मिलती, तब तक बातचीत की टेबल पर एक इंच भी आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है।
12 अरब डॉलर की बड़ी जिद: ईरान की पहली और सबसे सख्त शर्त
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ‘ईरान इंटरनेशनल’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने अमेरिका के सामने किसी भी शुरुआती समझौते यानी मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर करने से पहले कतर में फंसी अपनी 12 अरब डॉलर (करीब 11.45 लाख करोड़ रुपये) की भारी-भरकम राशि को तुरंत बिना शर्त जारी करने की मांग रख दी है।
सूत्रों के हवाले से खबर है कि ईरान का यह रुख इस बार बेहद सख्त है। ईरान की मांग है कि बातचीत के बिल्कुल पहले चरण में ही उसे इस पूरे फंड तक सीधी और पूरी पहुंच दी जाए, ताकि वह इसका इस्तेमाल अपनी मर्जी से कर सके। ईरान का कहना है कि यह 12 अरब डॉलर तो महज एक शुरुआत है, अंतिम समझौते के तहत दुनिया भर के अलग-अलग देशों में फ्रीज की गई उसकी सभी संपत्तियों को पूरी तरह से बहाल करना होगा।
ईरानी मीडिया ने भी लगाई मुहर: केवल खोखली घोषणाओं से काम नहीं चलेगा
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) से जुड़ी प्रभावशाली आधिकारिक न्यूज एजेंसी ‘तस्नीम न्यूज’ ने भी इस कूटनीतिक गतिरोध की पूरी तरह पुष्टि की है। तस्नीम की रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित समझौते की कई मुख्य शर्तों पर दोनों महाशक्तियों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं। ईरान ने अमेरिका को कड़े शब्दों में चेताया है कि वह केवल कागजी दावों या फंड रिलीज करने की खोखली घोषणाओं से बहलने वाला नहीं है। उसे उस रकम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मर्जी से ट्रांसफर करने और इस्तेमाल करने की पूरी आजादी चाहिए। दरअसल, ईरान इस फ्रीज फंड को अपनी चरमराई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह देख रहा है।
रणनीति का फेर: क्यों आमने-सामने आ गए हैं दोनों देश?
इस हाई-प्रोफाइल डील में सबसे बड़ा पेंच दोनों देशों की अपनी-अपनी रणनीतियों के टाइमिंग को लेकर फंसा हुआ है। वाशिंगटन चाहता है कि इस भारी-भरकम राशि की रिलीजिंग को अंतिम परमाणु समझौते (Final Nuclear Deal) की पूर्ण सफलता से जोड़ा जाए। यानी, जब ईरान परमाणु कार्यक्रम को रोकने की सभी शर्तों को जमीनी स्तर पर पूरी तरह मान लेगा, तब उसे यह पैसा सौंपा जाएगा। इसके बिल्कुल उलट, तेहरान की रणनीति यह है कि MoU के लागू होते ही फंड का एक बड़ा हिस्सा उसे फौरन मिल जाए और बाकी बची हुई रकम को बातचीत के आगे बढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे जारी करने का तरीका तय किया जाए। अमेरिका इस बात पर लगातार अड़ंगा लगा रहा है, जिसके चलते तस्नीम न्यूज ने यह बड़ी आशंका जताई है कि शर्तों पर सहमति न बनने के कारण यह पूरा समझौता किसी भी समय पूरी तरह टूट सकता है।
जानिए कतर वाले फंड की क्या है पूरी इनसाइड स्टोरी?
ईरान के इस पैसे का इतिहास काफी पुराना और पेचीदा है। इससे पहले अप्रैल महीने में अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में बताया था कि अमेरिका, कतर और अन्य विदेशी बैंकों में फंसी ईरान की 6 अरब डॉलर की राशि को जारी करने के लिए सहमत हुआ था। यह वह पैसा था जो ईरान को दक्षिण कोरिया को कच्चे तेल की बिक्री से हासिल हुआ था।
साल 2023 में दोनों देशों के बीच हुए कैदियों की अदला-बदली (Prisoner Swap) के एक ऐतिहासिक समझौते के बाद इस रकम को दक्षिण कोरियाई बैंक से कतर के विशेष खातों में ट्रांसफर किया गया था। हालांकि, उस समय अमेरिकी प्रतिबंधों की कड़ी निगरानी के कारण ईरान इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ भोजन, दवाइयों और बुनियादी मानवीय जरूरतों (Humanitarian Aid) के लिए ही कर सकता था। लेकिन अब ईरान इस पर से हर तरह की अमेरिकी निगरानी हटाकर इस पूरे 12 अरब डॉलर के फंड पर अपना संप्रभु और पूरा नियंत्रण चाहता है।
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