धर्मशाला-पालमपुर पर टिकी पूरे प्रदेश की निगाहें, शिमला के बाद दूसरे सबसे बड़े पावर सेंटर में साख की लड़ाई

हिमाचल प्रदेश की राजनीति का अगला रुख क्या होगा, इसका फैसला कल बाद धर्मशाला और पालमपुर से होने जा रहा है। धर्मशाला-पालमपुर नगर निगम के चुनाव महज़ एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं रह गए हैं, बल्कि यह भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए साख का सबसे बड़ा सवाल बन चुके हैं।
आगामी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हो रहे इन चुनाव को सूबे की सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा है। यही वजह है कि 31 मई को होने वाली मतगणना पर पूरे प्रदेश के राजनीतिक पंडितों और आम जनता की निगाहें टिक गई हैं। कुल 17 वार्डों वाले धर्मशााला नगर निगम में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को कम से कम नौ पार्षदों की बैसाखी की जरूरत है।
यहां बड़े-बड़े दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है और हर एक वार्ड में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। धर्मशाला व पालमपुर को राजधानी शिमला के बाद प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। कांगड़ा की राजनीति का केंद्र बिंदु होने के कारण यहां की हार-जीत का असर सीधे तौर पर पूरे प्रदेश के सियासी समीकरणों को प्रभावित करता है। यही कारण है कि दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है और अब 31 मई की सुबह का इंतज़ार है।
एसआईआर की मांग
नगर निगम चुनाव में कुछ वार्डों में कम मतदान होने के बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। स्थानीय नागरिक भी अब मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआई की मांग कर रहे हैं।
मतदान प्रतिशतता में बड़ी गिरावट पर संशय
धर्मशाला नगर निगम के वार्ड नंबर तीन में कुल 1487 पंजीकृत मतदाताओं में से महज 630 वोट ही पड़े। इसके चलते यहां का मतदान प्रतिशत गिरकर सिर्फ 42.35 फीसदी पर सिमट गया। माना जा रहा है कि इस कम वोटिंग के पीछे कागजी मतदाताओं का बड़ा हाथ है। बाहरी राज्यों के प्रवासी श्रमिकों के नाम वोटर लिस्ट में थे, जिनमें से मतदान के दिन इक्का दुका ही पहुंच पाए। तिब्बती समुदाय के सूची में सैंकड़ों नाम शामिल थे, लेकिन उनमें से आधे से भी कम लोग पोलिंग बूथ तक पहुंचे।
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