बिहार का 104 फीट ऊंचा केसरिया स्तूप आज भी रहस्य, 28 साल में 60 प्रतिशत ही हुआ उत्खनन

मोतिहारी। पूर्वी चंपारण का केसरिया बौद्ध स्तूप बिहार की ऐतिहासिक और बौद्ध विरासत का प्रमुख केंद्र है। करीब 104 फीट ऊंचे इस स्तूप को देखने देश-विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। हालांकि इसके इतिहास का बड़ा हिस्सा आज भी जमीन के नीचे छिपा हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वर्ष 1998 में यहां उत्खनन और संरक्षण का काम शुरू किया था, लेकिन अब तक स्तूप के करीब 60 प्रतिशत हिस्से का ही उत्खनन हो सका है।
पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए बिहार पर्यटन विभाग भी यहां सुविधाओं का विस्तार कर रहा है। करीब पांच एकड़ क्षेत्र में आवासीय सुविधा और कैफेटेरिया तैयार किया गया है। इसके अलावा लगभग 20 करोड़ रुपये की लागत से पर्यटक सुविधा केंद्र का निर्माण भी चल रहा है। खास बात यह है कि इस केंद्र को केसरिया स्तूप की प्रतिकृति के रूप में विकसित किया जा रहा है। परिसर में बिहार के अन्य प्रमुख बौद्ध स्थलों की प्रतिकृतियां भी प्रदर्शित की जा रही हैं।
उत्खनन से सामने आया बौद्ध इतिहास
उत्खनन शुरू होने से पहले स्थानीय लोग इस स्थान को ‘देउर’ के नाम से जानते थे। इसे लेकर कई स्थानीय मान्यताएं भी प्रचलित थीं। पुरातात्विक उत्खनन के बाद यहां मौजूद संरचना की पहचान बौद्ध स्तूप के रूप में हुई।
स्तूप में छह तल और एक गुंबद है। यहां बने कोष्ठकों से बुद्ध की क्षतिग्रस्त मूर्तियां भी मिली हैं। माना जाता है कि लंबे समय के दौरान स्तूप को नुकसान पहुंचा और इसका एक बड़ा हिस्सा मिट्टी के नीचे दब गया।
1934 के भूकंप में पहुंची थी भारी क्षति
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार 1934 के विनाशकारी भूकंप से पहले स्तूप की ऊंचाई करीब 150 फीट तक होने का अनुमान है। भूकंप के बाद इसकी संरचना को भारी नुकसान पहुंचा और वर्तमान में इसकी ऊंचाई करीब 104 फीट रह गई है। पुरातत्वविदों का मानना है कि स्तूप का कुछ हिस्सा अभी भी जमीन के नीचे मौजूद हो सकता है।
ब्रिटिश काल में भी इस स्थल के अध्ययन और उत्खनन के प्रयास हुए थे। वर्ष 1814 में मैकेंजी और 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम से जुड़े प्रयासों के प्रमाण मिलते हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में भी इस क्षेत्र का उल्लेख होने की बात कही जाती है।
भगवान बुद्ध से जुड़ी मान्यताएं
केसरिया स्तूप को भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों में माना जाता है। बौद्ध परंपराओं के अनुसार, गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने इसी क्षेत्र में राजसी वस्त्रों का त्याग कर संन्यासी जीवन की शुरुआत की थी।
एक अन्य मान्यता के मुताबिक, महापरिनिर्वाण के लिए कुशीनगर जाते समय भगवान बुद्ध ने यहां एक रात बिताई थी। इसके बाद उन्होंने अपने शिष्य आनंद को भिक्षापात्र सौंपकर अन्य शिष्यों को वैशाली लौटने के लिए कहा था।
स्तूप की संरचना में शुंग, कुषाण और गुप्त काल से जुड़े पुरातात्विक प्रमाण मिलने की बात भी सामने आई है। यही वजह है कि केसरिया स्तूप धार्मिक आस्था के साथ-साथ इतिहास और पुरातत्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
अभी भी कई सवालों के जवाब बाकी
करीब 28 साल से चल रहे उत्खनन के बावजूद स्तूप का पूरा स्वरूप और इससे जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य सामने नहीं आ सके हैं। इसके आसपास के संभावित पुरातात्विक स्थलों के विकास और उत्खनन की दिशा में भी काम किए जाने की तैयारी है।
पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और भविष्य में होने वाले उत्खनन से उम्मीद है कि जमीन के नीचे छिपे केसरिया स्तूप के इतिहास की कई और परतें सामने आ सकती हैं।
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