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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “डिग्री छिपाकर सरकारी नौकरी पाना धोखा”, हाई कोर्ट का आदेश पलटा

देश में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले करोड़ों युवाओं के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत से एक बहुत ही महत्वपूर्ण और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकारी नौकरी सिर्फ उसी उम्मीदवार को मिलनी चाहिए जो उसके लिए तय की गई जरूरी योग्यता को पूरा करता हो।

अदालत का मानना है कि कम योग्यता वाले पदों पर ज्यादा पढ़े-लिखे यानी अधिक योग्यता वाले लोगों को नौकरी देना, असल में उन गरीब या कम पढ़े-लिखे उम्मीदवारों के साथ अन्याय है जो वास्तव में उस पद के असली हकदार हैं। ऐसा करने से पात्र अभ्यर्थियों का हक मारा जाता है।

सिर्फ निर्धारित योग्यता वालों को ही मिले नौकरी: SC

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की दो सदस्यीय पीठ ने यह बेहद कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस पुराने आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया, जिसमें एक अस्थायी बैंक सहायक (बैंक असिस्टेंट) को दोबारा नौकरी पर बहाल करने के लिए कहा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मद्रास हाई कोर्ट ने इस बेहद जरूरी बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि उस कर्मचारी ने बैंक में नौकरी पाने के लिए धोखाधड़ी की थी। उसने अपनी ग्रेजुएशन (स्नातक) की डिग्री को छिपाया और जानबूझकर उस पद के लिए अप्लाई किया जो केवल 10वीं पास उम्मीदवारों के लिए रिजर्व था।

इस मामले पर गंभीर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि सरकारी क्षेत्र में कोई भी नौकरी सभी पात्र उम्मीदवारों को उनके लिए निर्धारित की गई योग्यता के हिसाब से ही दी जानी चाहिए। जब सरकार या कोई विभाग किसी पद को कम शैक्षणिक योग्यता वाले लोगों के लिए तय करता है, तो उसमें किसी ज्यादा डिग्री वाले व्यक्ति को घुसने की अनुमति देना गलत है। यह उन लोगों को उनके सुनहरे मौके से वंचित करने जैसा है जो केवल उसी पद के भरोसे बैठे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट का आदेश क्यों पलटा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को गहराई से समझते हुए उस कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त करने के बैंक के फैसले को पूरी तरह सही और जायज ठहराया है। अदालत ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ इसके पीछे के सामाजिक और आर्थिक कारणों को भी समझाया। पीठ का कहना था कि नौकरियों में शैक्षणिक योग्यता की एक ऊपरी सीमा (मैक्सिमम क्वालिफिकेशन लिमिट) तय करने के पीछे सरकार का तर्क बिल्कुल सही और न्यायसंगत है। इसका असली मकसद समाज के उन लोगों को रोजगार के अवसर देना है जो जीवन की मुश्किल परिस्थितियों, गरीबी या संसाधनों की कमी के कारण आगे की पढ़ाई नहीं कर सके।

अदालत ने आगे कहा कि एक आदर्श नियोक्ता (यानी एक जिम्मेदार सरकार) के तौर पर यह पूरी तरह सही कदम है कि वह कुछ श्रेणियों के पदों को ऐसे कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए आरक्षित रखे। इससे यह फायदा होता है कि इन सीधे-साधे और कम पढ़े-लिखे उम्मीदवारों को उन हाई-क्वालिफाइड (ज्यादा पढ़े-लिखे) अभ्यर्थियों के साथ मुकाबला नहीं करना पड़ता, जिनके पास बड़ी डिग्रियां हैं। अगर दोनों के बीच मुकाबला होगा, तो कम पढ़े-लिखे लोगों के चयन की संभावना न के बराबर रह जाएगी। यही वजह है कि ऐसी कल्याणकारी नीतियों को देश की अदालतों ने हमेशा सही और जरूरी माना है।

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