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ठाकुरों से दुश्मनी, मगर एक ठाकुर को मानती थीं भाई... जानिए 'बैंडिट क्वीन' फूलन देवी की अनसुनी कहानी.

 


कभी चंबल घाटी में अपने आतंक से बड़े-बड़ों की गद्दी हिला देने वाली दस्यु सुंदरी फूलन देवी को पहली राजनैतिक महिला डाकू कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा. चंबल घाटी में बैंडिट क्वीन के नाम से विख्यात रही महिला डाकू फूलन देवी अपने रिश्ते के भाई ठाकुर जसवंतसिंह को हर रक्षाबंधन पर राखी बांधने आया करती थी.

फूलन देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनसे जुड़े हुए किस्से कहानी अब भी लगातार सुर्ख़ियो में बने हुए है. 10 अगस्त को फूलन देवी की जयंती है. जाहिर है ऐसे में फूलन से जुड़ी हुई इस कहानी की लोग बड़ी ही दिलचस्पी से पढ़ना चाहेंगे.

इटावा जिले की चकरनगर तहसील के गढ़ाकस्दा गांव के रहने वाले हेमरुद्र सिंह सेंगर ने बताया कि फूलन देवी उनके पिता जसवंतसिंह सेंगर को भाई मानती थीं और जब उन्हें भूख लगती थी, तब वह अपनी गैंग के साथ उनके गांव आती थीं और पिताजी खाना बनवाकर उन्हें खिलाते थे. फूलन देवी रक्षा बंधन पर उनके पिताजी को राखी बांधने आती थीं. बेहमई कांड के बाद भी ठाकुर समाज के लोग पिताजी के खिलाफ नहीं गए थे, क्योंकि पिताजी सामाजिक स्वभाव के थे और चकरनगर से दो दफा ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य भी रहे थे और वह हमेशा हर वर्ग के कमजोर और पीड़ितों की मदद करते थे, इसलिए हर वर्ग के लोग उन्हें सम्मान देते थे.

गैंग के साथ खाना खाती थीं फूलन देवी
सेंगर ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि फूलन देवी से संबंध होने की जानकारी मिलने के बाद तत्कालीन एसएसपी ने उनके पिताजी पर कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी. जब वह 10 और 11 साल के थे, तब फूलन देवी उनके पिता के पास रक्षाबंधन पर राखी बनवाने के लिए अपनी गैंग के साथ में आया करती थी. इतना ही नहीं, फूलन देवी अपने गैंग के आधा दर्जन डाकुओं के साथ चार-पांच घंटे रुककर खाना खाकर वापस लौट जाया करती थी.

उन्होंने बताया कि कई किस्से तो ऐसे भी हैं कि डाकुओं के लिए खाना बन रहा होता था, इसी बीच कांबिंग करती हुई पुलिस भी आ जाया करती थी और पिताजी से खाने की मांग करती थी, तो पहले पुलिस को खाना खिलाया जाता था और उसके बाद डाकुओं को खाना खिलाने की प्रक्रिया अपनाई जाती थी.

ऐसे राजनीति के शीर्ष तक पहुंची फूलन देवी
उन्होंने बताया कि उनके गांव में मल्लाह बिरादरी की बड़ी संख्या में आबादी है. मल्लाह बिरादरी के कई डाकू फूलन देवी गैंग के सदस्य भी थे, इसलिए फूलन देवी का गांव में आना-जाना बना रहता था. उन्होंने बताया कि जब पुलिस को डाकू फूलन देवी के गांव में आने की जानकारी होती थी, तो अजीतमल और चकरनगर की पुलिस उनके पिता जी के पास आया करती थी. ठाकुरों के प्रति बेहद तल्ख रही फूलन देवी को चंबल इलाके के ठाकुर राजनेता जसवंत सिंह की बदौलत ही राजनीति के शीर्ष तक जाने का मौका मिला.

ठाकुरों की दुश्मन बन गईं थी फूलन देवी
फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के पुरवा गांव में हुआ था. फूलन देवी एक मल्लाह परिवार की थीं, इस वजह से तथाकथित ऊंची जाति के लोग उनसे घृणा करते थे. फूलन देवी को ठाकुर जाति के दुश्मन के रूप में याद किया जाता है. बदला लेने के लिए डकैत फूलन ने 14 फरवरी 1981 को कानपुर के बेहमई में 22 ठाकुरों को मौत की नींद सुला दिया था. तब से फूलन के प्रति ठाकुरों में नफरत है, लेकिन यह भी सच है कि बेहमई कांड के बाद ठाकुर जसवंत सिंह ने ही फूलन देवी की कदम दर कदम मदद की थी और उन्हें राजनीति का ककहरा पढ़ाया था.

फूलन देवी ने ऐसे किया खुलासा
फूलन देवी के ठाकुर से लगाव का खुलासा तब हुआ, जब वह भदोही से सासंद बन गई थीं. चंबल इलाके के चकरनगर में समाजवादी पार्टी की एक सभा थी, जिसमें मुलायम सिंह भी मौजूद थे. ठाकुर बहुल इलाके में आयोजित इस सभा में पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने फूलन देवी को निर्देश दिया कि वे अपने संबोधन में ठाकुरों के सम्मान में भी कुछ बोलें, तब फूलन को कुछ समझ में नहीं आया. उन्होंने तब इस बात का खुलासा किया कि भले ही मुझे ठाकुरों से नफरत के लिए याद किया जाता है, लेकिन बेहमई कांड के बाद मेरी सबसे ज्यादा मदद एक ठाकुर ने ही की थी.

उन्होंने इलाके के प्रभावशाली ठाकुर नेता जसवंत सिंह सेंगर का नाम लेते हुए बताया कि बेहमई कांड के बााद जब वह गैंग के साथ जंगलों में दर-दर भटक रही थीं, तब सेंगर साहब ने ही महीनों उन्हें शरण दी, खाने पीने से लेकर अन्य संसाधन भी उपलब्ध करवाए. इस जनसभा को हुए वर्षों बीत गए, लेकिन आज भी फूलन और सेंगर की चर्चा चंबल में होती है.

सपा की टिकट पर बनीं मिर्जापुर की सांसद
बेहमई कांड के बाद फूलन देवी ने 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर 10 हजार लोगों और 300 पुलिस वालों के सामने आत्म समर्पण कर लिया. उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा. आत्मसमर्पण करने के बाद फूलन देवी को 8 सालों की सजा दी गई. 1994 में वह जेल से रिहा हुईं. रिहा होने के बाद उन्होंने राजनीति में एंट्री ली. वह दो बार चुनकर संसद पहुंची. पहली बार वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर मिर्जापुर से सांसद बनी थीं.

क्या फूलन देवी की हत्या राजनीतिक षडयंत्र?
फूलन देवी की हत्या 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में घर के सामने कर दी गई. हत्या में शेर सिंह राणा का नाम आया, जिसने स्वीकारा कि उसने क्षत्रिय समाज के अपमान का बदला लिया है. कुछ समय बाद शेर सिंह ने एक वीडियो क्लिप जारी करके अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधी ढूढंकर उनकी अस्थियां भारत लेकर आने की कोशिश का दावा किया. हालांकि बाद में दिल्ली पुलिस ने उसे पकड़ लिया. फूलन की हत्या को राजनीतिक षडयंत्र भी माना जाता है. उनकी हत्या के छींटे उसके पति उम्मेद सिंह पर भी आए, हालांकि वह आरोपित नहीं हुए. ठाकुर जसवंत सिंह और फूलन देवी के रिश्ते को लेकर चंबल इलाके में किस्से कहानिया चर्चाओं में बने हुए हैं.

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