20 साल की उम्र में भारत आई जर्मन महिला, यहीं बना लिया अपना घर, अब 2500 से ज्यादा गायों की करती हैं सेवा

Viral Video : कभी दुनिया घूमने निकली एक जर्मन युवती ने शायद खुद भी नहीं सोचा होगा कि भारत की एक यात्रा उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल देगी. 1978 में महज 20 साल की उम्र में जर्मनी के बर्लिन से भारत आईं फ्रेडरिके इरिना ब्रूनिंग आज 'सुदेवी माता जी' के नाम से जानी जाती हैं.
उनका जीवन आध्यात्मिक खोज से शुरू हुआ और आगे चलकर बीमार, घायल और बेसहारा गायों की सेवा को समर्पित हो गया.
गुरु की तलाश में पहुंचीं राधा कुंड
भारत आने के बाद फ्रेडरिके की रुचि यहां की आध्यात्मिक परंपराओं और योग में बढ़ने लगी. भगवद्गीता से प्रभावित होकर उन्होंने गुरु की तलाश शुरू की और आखिरकार मथुरा के राधा कुंड पहुंचीं. यहां उन्होंने अपने गुरु से दीक्षा ली और करीब दो दशक तक आध्यात्मिक साधना में समय बिताया. इसी दौरान उन्हें 'सुदेवी दासी' नाम मिला.
लेकिन उनकी जिंदगी में असली मोड़ तब आया, जब एक पड़ोसी की सलाह पर उन्होंने एक गाय खरीदी. इसके बाद गायों के प्रति उनका लगाव लगातार बढ़ता गया. उन्होंने देखा कि बूढ़ी, बीमार और दूध न देने वाली कई गायों को लोग बेसहारा छोड़ देते हैं.
घायल बछड़े ने बदल दी जिंदगी
एक घायल बछड़े को देखकर सुदेवी माता जी का मन विचलित हो गया. वह बछड़ा गंभीर रूप से घायल था और उसकी हालत बेहद खराब थी. उन्होंने उसे अपने पास लाकर इलाज और देखभाल शुरू की. यही घटना आगे चलकर उनके जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य की शुरुआत बनी.
धीरे-धीरे उन्होंने राधा कुंड में Radha Surabhi Gaushala की स्थापना की. शुरुआत एक-दो गायों से हुई थी, लेकिन समय के साथ यहां बीमार, घायल और छोड़ी गई गायों की संख्या बढ़ती गई. मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, गौशाला में अब 2,500 से ज्यादा गायों की देखभाल की जा रही है.
अपनी कमाई भी गायों की सेवा में लगाईं
सुदेवी माता जी ने इस सेवा को चलाने के लिए लंबे समय तक जर्मनी में अपनी संपत्ति से मिलने वाली आय का इस्तेमाल किया. उनके लिए गौशाला सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि उन जानवरों का घर है जिन्हें समाज ने छोड़ दिया. उनकी इसी निस्वार्थ सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया. आधिकारिक पद्म पुरस्कार सूची में उनका नाम सामाजिक कार्य की श्रेणी में दर्ज है.
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