'ये हादसा नहीं, जानबूझकर लगाई गई आग लगती है'; ₹2.4 करोड़ के फायर इंश्योरेंस क्लेम पर SC का बड़ा फैसला

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग(एनसीडीआरसी) के न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के फायर इंश्योरेंस क्लेम के रूप में 2.4 करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश को रद कर दिया।
शीर्ष अदालत ने माना कि बीमा कंपनी द्वारा दावे को खारिज करने का फैसला पूरी तरह से उचित था।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने बीमा कंपनी की अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि बीमित कंपनी ने अपने दावों के समर्थन में झूठी जानकारियां दी थीं, जो स्पष्ट रूप से पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक पेपर बोर्ड निर्माता कंपनी से जुड़ा है, जिसके पास एक ओपन यार्ड और तीन गोदाम थे। कंपनी ने न्यू इंडिया एश्योरेंस से दो फायर पॉलिसी ले रखी थीं। एक पॉलिसी स्टॉक के लिए 13 करोड़ रुपये और दूसरी इमारत, प्लांट और मशीनरी के लिए 14 करोड़ रुपये थी।
मई 2007 में फैक्ट्री के अंदर वेस्ट पेपर यार्ड में आग लग गई, जिससे कच्चा माल और टिन शेड क्षतिग्रस्त हो गया। नुकसान के बाद कंपनी ने NCDRC में 18% सालाना ब्याज के साथ लगभग 7.31 करोड़ रुपये के क्लेम का दावा किया था।
खातों में हेरफेर का आरोप
क्लेम मिलने के बाद बीमा कंपनी ने एक सर्वेयर नियुक्त किया। सर्वेयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह जानबूझकर लगाई गई आग और फर्जी नुकसान का मामला हो सकता है, इसलिए इसकी गहन जांच की आवश्यकता है। इसके बाद एक जांच एजेंसी को काम पर लगाया गया।
अंतिम सर्वेयर ने वास्तविक नुकसान का आकलन मात्र 46,09,722 रुपये किया और बताया कि बीमाधारक ने ज्यादा क्लेम हासिल करने के लिए अपनी अकाउंट्स बुक में हेरफेर की है। इसके आधार पर, बीमा कंपनी ने पॉलिसी की शर्त 6 और 8 के उल्लंघन का हवाला देते हुए क्लेम को खारिज कर दिया था।
NCDRC के आदेश को SC ने पलटा
इससे पहले, NCDRC ने अपने फैसले में कहा था कि चूंकि आग लगने का कारण ज्ञात नहीं है, इसलिए बीमा कंपनी को आग का कारण या सत्यता साबित करने की जरूरत नहीं है। आयोग को क्लेम पर संदेह करने का कोई कारण नजर नहीं आया और उसने बीमा कंपनी को 45 दिनों के भीतर 2.4 करोड़ रुपये ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया।
समय सीमा पार होने पर 12% सालाना ब्याज लगाने का प्रावधान किया गया था। इसके अतिरिक्त सेवा में कमी के लिए 3 लाख रुपये और हर्जाने के रूप में 1 लाख रुपये का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के फैसले को अनुचित मानते हुए कहा कि तथ्य स्पष्ट रूप से बीमाधारक के खिलाफ जाते हैं। अदालत ने बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 64UM का हवाला दिया, जिसके अनुसार 20,000 रुपये या उससे अधिक के दावे का आकलन अनुमोदित सर्वेयर द्वारा किया जाना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सर्वेयर की रिपोर्ट किसी भी पक्ष के लिए अंतिम रूप से बाध्यकारी नहीं होती है, लेकिन बीमा कंपनी के पास इसे खारिज करने का जो विशेषाधिकार है, उसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले सर्वेयर ने साफ शब्दों में आगे की जांच की वकालत की थी, इसलिए दूसरे सर्वेयर की नियुक्ति भी उचित थी।
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