लहसुन-प्याज के इतने फायदे फिर भी जैन समाज क्यों नहीं करता सेवन? वायरल वीडियो में जैन मुनि के जवाब पर बजने लगीं तालियां
Why Jains Avoid Root Vegetables: सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें 'भाभी जी घर पर है' के कलाकार सानंद वर्मा ने मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज से पूछ रहे हैं कि आखिर जैन समाज के लोग लहसुन और प्याज क्यों नहीं खाते.
लहसुन और प्याज भारतीय किचन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इनमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं और सामान्य आहार में इनका इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी किया जाता है. इसके बावजूद जैन धर्म में प्याज, लहसुन, आलू और कई अन्य जमीन के अंदर उगने वाले कंद-मूल का सेवन नहीं किया जाता. इसके पीछे स्वास्थ्य से ज्यादा धार्मिक और अहिंसा से जुड़ी मान्यताएं महत्वपूर्ण हैं. आइए जानते हैं वायरल वीडियो में क्या है और जैन समाज के लोग लहसुन और प्याज क्यों नहीं खाते…
क्या है वायरल वीडियो में?
वायरल वीडियो में सानंद वर्मा मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज का आशीर्वाद लेते हैं और फिर सवाल करते हैं आखिर जैन समाज के लोग लहसुन और प्याज क्यों नहीं खाते. सागरजी महाराज इसका जवाब देते हैं, जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. इसमें सागरजी महाराज सानंद वर्मा से पूछते हैं कि आप सबसे ज्यादा किस समाज की खोपड़ी को तेज मानते हैं. इस पर हंसी मजाक में सागरजी महाराज कहते हैं कि बनिया की खोपड़ी को.
सागरजी महाराज ने दिया जवाब
सागरजी महाराज कहते हैं कि जैन समुदाय के बनिया की खोपड़ी क्यों तेज होती है, उसका मूल कारण है कि वह जमीन के अंदर के पदार्थ नहीं खाता है क्योंकि जमीन के अंदर का पदार्थ अंधेरे में रहता है, वो किचड़ में खाता है. उसमें गीलापन रहता है और कीचड़ के साथ ही उसकी जिंदगी बनती है, कीचड़ के साथ ही वह बनता है, कीचड़ के साथ ही वह जन्मता और फलता है, उसी के साथ पूरी जिंदगी व्यतीत करता है, अंधकार में रहता है. इस कारण साइकोलॉजी कहती है कि जमीन के नीचे के फल खाओगे तो घुटने मजबूत होंगे और मजदूर बनोगे. वहीं अगर जमीन के ऊपर के फल में ऑक्सीजन और प्रकाश होता है. वह फूल धूल से रहित होता है. जो व्यक्ति जमीन के ऊपर के फल खाता है, उसकी खोपड़ी तेज होती है. इसलिए जैन समुदाय की खोपड़ी बहुत तेज होती है.
सागरजी महाराज का दूसरा जवाब
वीडियो में आगे महाराजजी दूसरा कारण बताते हुए कहते हैं कि जो चीज जमीन के नीचे होती हो, उसके साथ छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति भी हो जाती है, उसको उखाड़ कर खाने से जीवों का विनाश ज्यादा होता है. ये अंहिसा की दृष्टि से है और वो साइकोलॉजी दृष्टि से है. इसके बाद सानंद वर्मा कहते हैं कि आज के बाद कोशिश करूंगा कि जमीन के उपर के फल हमेशा खाऊं.जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है. जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में आत्मा होती है और किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुंचाना हिंसा माना जाता है. इसी सिद्धांत के आधार पर भोजन का चयन भी इस तरह करने पर जोर दिया जाता है, जिससे जीवों को कम से कम नुकसान पहुंचे.
जमीन के अंदर की सब्जियां क्यों नहीं खाते?
जैन आहार परंपरा में आलू, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली जैसे कई कंद-मूल को लेकर विशेष नियम माने जाते हैं. इन पौधों को जमीन से निकालते समय पूरा पौधा उखाड़ना पड़ता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंच सकता है और एक साथ कई जीवों की हिंसा होने की आशंका रहती है. इसके अलावा, कंद-मूल के एक हिस्से से दोबारा पौधा विकसित होने की क्षमता को भी जैन दर्शन में जीवों की उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए अनेक जैन परिवार ऐसे खाद्य पदार्थों से पूरी तरह परहेज करते हैं.
प्याज और लहसुन को लेकर क्या मान्यता है?
जैन परंपरा में प्याज और लहसुन का त्याग केवल इसलिए नहीं किया जाता कि वे जमीन के अंदर उगते हैं, बल्कि इनके सेवन को लेकर संयम और आध्यात्मिक साधना से जुड़ी मान्यताएं भी हैं. जैन धर्म में भोजन को शरीर की जरूरत पूरी करने के साथ-साथ मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का माध्यम माना जाता है. जैन साधु-साध्वियों के आहार में तो नियम और भी कठोर होते हैं. भोजन में ऐसी चीजों से बचने पर जोर दिया जाता है, जिनके लिए अधिक जीवों की हिंसा हो सकती है या जो साधना और संयम के उद्देश्य के अनुकूल ना मानी जाएं.

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