Recent Posts

Breaking News

क्‍या है ये 'इनव‍िज‍िबल टैक्स', ज‍िसकी कीमत हर ऑफिस में चुका रही हैं मह‍िलाएं?

क्‍या है ये 'इनव‍िज‍िबल टैक्स', ज‍िसकी कीमत हर ऑफिस में चुका रही हैं मह‍िलाएं?


फिस में राघव की बर्थडे पार्टी थी. सभी साथ उठे, राघव का केक भी आ चुका था. तालियां बजी और उसने प‍हला निवाला बॉस को ख‍िलाया. फिर अपने कुछ करीबी दोस्‍तों को और इसके बाद तुरंत सब केक और पास में रखे समोसे और म‍िठाई के ड‍िब्‍बे के पास आ गए.


इससे पहले कि को अपने हाथ से कुछ लेता, सुधा जी ने तुरंत प्‍लेटें उठाई और लोगों को बांटने लगीं. वो अकेले नहीं रहीं, उन्‍होंने अपने साथ शाल‍िनी को भी आने को कहा. शाल‍िनी ने मदद तो की, लेकिन उसे ये पसंद नहीं आया…

हो सकता है ऐसा ही कुछ सीन आपके भी ऑफिस में हो, पर आपको इसमें ज्‍यादा कुछ गलत न लगे. ये अकेला काम नहीं है. "ऑफिस पार्टी की प्लानिंग कौन करेगा?", "तनाव में दिख रही रीमा से कोई बात कर लेगा?" अक्सर ऐसे काम ऑफिसों में फीमेल कलीक्‍ग्‍स के मत्‍थे ही मढ़े जाते हैं. हालांकि ये मह‍िलाओं की नौकरी के वो काम हैं, जो उनके जॉब डिस्क्रिप्शन में कभी लिखे ही नहीं होते. यही है वो 'इनविजिबल टैक्स', जो दुनिभर के दफ्तरों में महिलाएं सालों से चुका रही हैं.


ऑफिस में महिलाओं पर पड़ने वाला अदृश्य बोझ

भले ही ये टैक्‍स आपकी सेलरी स्‍ल‍िप में लगकर नहीं आता, लेकिन ये कर्मचार‍ियों के इमोशंस और यहां तक की मेंटल हेल्‍थ के रूप में वसूला जाता है. ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ महिलाओं के साथ होता है, लेकिन इस खाम‍ियाजे का ज्‍यादा प्रतिशत औरतों के ह‍िस्‍से में ही आता है. 'साइंस डायरेक्‍ट' में Women's Studies International Forum की एक 2024 में प्रकाशित एक इंटरनेशनल स्‍टडी में पाया गया कि ऑफिस के अदृश्य काम और वेतन के बीच सीधा संबंध हो सकता है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ मामलों में यही काम पुरुषों के लिए करियर लाभ बन जाता है, जबकि महिलाओं के लिए उसका उतना फायदा नहीं दिखता. क्‍योंकि ये उनकी ड्यूटी मानी जाती है. विशेषज्ञ इसे "ऑफिस हाउसवर्क" कहते हैं. यह वह काम है जो कंपनी को चलाने में मदद करता है, लेकिन प्रमोशन या बोनस के समय अक्सर गिना नहीं जातारिसर्च बताती है कि यह जिम्मेदारी महिलाओं पर ज्यादा डाली जाती है.

आसान भाषा में समझें तो किसी भी ऑफिस में दो तरह के काम होते हैं. पहला, वह जो दिखता है. जैसे रिपोर्ट बनाना, सेल्‍स बढ़ाना, कोड लिखना, क्लाइंट संभालना यानी वो काम ज‍िनके ल‍िए आपको तारीफ म‍िलती है. दूसरा, वो काम जो माहौल को चलाता है. लोगों के बीच तालमेल बनाए रखना, टीम की परेशानियां सुनना, नए कर्मचारियों को सहज महसूस कराना, समारोह आयोजित करना, विवाद सुलझाना वगैरह-वगैरह. इस दूसरे तरह के काम की द‍िक्‍कत ये है कि इनका अक्‍सर कोई र‍िकॉर्ड नहीं रखा जाता. हालांकि ये क‍िसी भी ऑफिस को चलाने के ल‍िए बेहद जरूरी है. लेकिन इसके ल‍िए क‍िसी मह‍िला को बोनस नहीं म‍िलता. यही है वो 'इमोशनल लेबर', ज‍िसे कभी "ऑफिस हाउसवर्क" और कभी "इनविजिबल वर्क" कहा जाता है.

'तुम तो अच्छे से संभाल लेती हो'

कई महिलाओं ने शायद ये लाइन अपने ऑफिस में जरूर सुनी होगी. पहली नजर में ये तारीफ लगती है. लेकिन धीरे-धीरे यही उनकी अनकही ज‍िम्‍मेदारी बन जाती है. अगर टीम में तनाव है तो महिला कर्मचारी आगे आएगी. अगर किसी को भावनात्मक सहारे की जरूरत है तो महिला सुनने बैठेगी. अगर आयोजन करना है तो महिला ही सूची बनाएगी. इन कामों में कोई द‍िक्‍कत नहीं है. खासकर भावनाओं को बेहतर समझने वाली मह‍िलाओं के ल‍िए तो ब‍िलकुल भी नहीं. लेकिन परेशानी वहां से शुरू होती है जब फीमेल एंप्‍लॉय से इन चीजों की उम्‍मीद की जाए. दरअसल इस तरह के मानसिक और भावनात्मक श्रम को 'काम' की श्रेणी में ग‍िना ही नहीं जाता.


मह‍िलाओं की नौकरी के वो काम हैं, जो उनके जॉब डिस्क्रिप्शन में कभी लिखे ही नहीं होते. यही है वो 'इनविजिबल टैक्स', जो दुनिभर के दफ्तरों में महिलाएं सालों से चुका रही हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार भावनाओं को नियंत्रित करना, दूसरों को सहज महसूस कराना और अपनी नाराजगी को दबाकर पेशेवर बने रहना व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा को खत्म कर सकता है.

The International Journal of Indian Psychȯlogy में प्रकाश‍ित भारत में की गई एक स्‍टडी बताती है कि ऐसी अनकही जिम्मेदारियां निभाने वाली कामकाजी महिलाओं में मानसिक थकान और बर्नआउट का खतरा काफी बढ़ जाता है. प्रमोशन के समय कंपनी अक्सर सेल्‍स, मुनाफा, प्रोजेक्ट या परफॉर्मेंस के आंकड़े देखती है. लेकिन आपकी इमोशनल केपेब‍िलीटी की बात कहीं नहीं होती. आपने टीम को क‍ितना मोटीवेट क‍िया या संभाल कर रखा इसकी बात क‍िसी जगह नहीं होती. स‍िर्फ ऑफिस ही नहीं, कई मह‍िलाएं घर पहुंचकर अपनी 'तीसरी शिफ्ट' में भी काम करती हैं. घर पहुंचकर बच्चों के स्‍कूल का शेड्यूल देखना, राशन की ल‍िस्‍ट, डॉक्टर की अपॉइंटमेंट याद रखना, बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना. यह सब भी काम है. बस इसका वेतन नहीं मिलता. विशेषज्ञ इसे "कॉग्निटिव लेबर" या "थर्ड शिफ्ट" कहते हैं-वह मानसिक बोझ जो लगातार दिमाग में चलता रहता है.



मह‍िलाओं के इस 'एक्‍स्‍ट्रा टैक्‍स' की कहानी कोई नई नहीं है. 1990 से लगातार इस व‍िषय पर दुन‍ियाभर में शोध हो रहे हैं. पिछले तीन दशकों से शोधकर्ता इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि महिलाओं के काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संगठनों की सफलता में योगदान देता है, लेकिन उसे अक्सर औपचारिक मान्यता नहीं मिलती.

No comments