सर तन से जुदा... नारे को हाईकोर्ट ने क्यों माना भारतीय अखंडता के लिए खतरा, क्या कहता है कानून?

बरेली हिंसा मामले में आरोपी मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सर तन से जुदा नारे पर तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने इस नारे को भारतीय अखंडता के लिए खतरा बताया.
साथ ही ये कहा कि इसकी तुलना धार्मिक आस्था से जुड़े तारों से कतई नहीं की जा सकती.
उत्तर प्रदेश के बरेली में 26 सितंबर 2025 को हुई हिंसा में मौलाना तौकीर रजा को मुख्य आरोपी बनाया गया था. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी दाखिल की थी. जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने जमानत याचिका की सुनवाई करते कहा कि सर तन से जुदा नारे को धार्मिक उद्धघोष मसलन अल्लाहु अकबर, जय श्रीराम, हर-हर महादेव या जो बोले सो निहाल के बराबर नहीं रखा जा सकता. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर इस नारे को खतरा मानने का कानूनी आधार क्या है? ऐसे मामले में BNS की कौन सी धारा लागू होती है?
क्या है सर तन से जुदा का मतलब?
पिछले दिनों देश में सर तन से जुदा नारा खूब सुनाई दिया था. पूरा नारा था- गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा… इसका अर्थ है कि पैगंबर साहब का अपमान करने वाले व्यक्ति की एक ही सजा है उसका सिर काटना. यानी नारा सिर्फ एक धार्मिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, ये सजा भी तय करता है, जबकि भारत में यह अधिकार सिर्फ अदालतों के पास है. इससे पहले दिसंबर 2025 में भी अपने एक आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि इस तरह का नारा भारतीय कानून और संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाला है.
ऐसे नारों के लिए क्या है कानून?
अगर कोई व्यक्ति ऐसे नारे लगाता है, जिससे कानून व्यवस्था या देश की एकता ओर अखंडता को खतरा है तो उस पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के तहत कार्रवाई की जा सकती है. कोर्ट ने भी बरेली हिंसा मामले में इसका जिक्र किया.
धारा के तहत शब्दों के जरिए, लिखित सामग्री के जरिए, संकेतों के जरिए, किसी और माध्यम से अलगाववाद, सशस्त्र विद्रोह को उकाया गया, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालता है तो उस पर कार्रवाई हो सकती है. इसमें सात साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है. हालांकि सिर्फ नारा लगाने से ये धारा नहीं लगती, लेकिन अगर ये साबित होता है कि नारे की वजह से ऐसा हो सकता है तो कार्रवाई की जा सकती है, जैसा की बरेली हिंसा मामले में हुआ.
नारा कैसे हुआ कानून के अधिकार के लिए चुनौती?
पहला: हाईकोर्ट ने कहा कि यह नारा लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित करता है. इसीलिए कोर्ट ने इसे सार्वजिनक व्यवस्था और राज्य के अधिकार के खिलाफ उकसावे के रूप में देखा. हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है, नारा सर तन से जुदा की वकालत करता है. इसलिए यह समानांतर दंड व्यवस्था की वकालत करता नजर आ रहा है जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है.
दूसरा: भारत में सजा देने के लिए न्याय व्यवस्था है, उसका पालन कराने के लिए अलग-अलग कानून बनाए गए हैं. ऐसे में किसी धार्मिक या सामाजिक समूह को अपनी तरफ से किसी व्यक्ति के लिए मौत की सजा तय करने का अधिकार नहीं है.
तीसरा : अगर नारे को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा जाए तो संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देता है, लेकिन संप्रभुता, अखंडता और सार्वजिनक व्यवस्था की रक्षा के लिए कानून अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगा सकता है.
चौथा : कोर्ट ने कहा कि सर तन से जुदा नारे को धार्मिक नहीं माना जा सकता. इसलिए क्योंकि ये देखा जाएगा कि नारा किस उद्देश्य से लगाया गया, किसने खिलाफ था. यह नारा सीधे तौर पर हिंसा या सशस्त्र विद्रोह को उकसाने वाला माना जा सकता है.
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