'मेरे ऑफिस में दो गधे हैं' से कांग्रेस को जानकारी लीक करने तक... चुनाव आयोग में मतभेद का लंबा रहा है इतिहास

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चुनाव आयोग में मतभेदों को लेकर इन दिनों बवाल मचा हुआ। यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग के अंदर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। यह सिलसिला 1989 में आयोग के बहु-सदस्यीय निकाय बनने के समय से शुरू हुआ था।
अक्टूबर 1989 में दो चुनाव आयुक्तों एस.एस. धनोआ और वी.एस. सेगल की नियुक्ति हुई और वे मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) आर.वी.एस. पेरी शास्त्री के नेतृत्व वाली चुनाव संस्था में शामिल हुए। हालांकि शास्त्री ने इस बारे में कभी सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा लेकिन आम तौर पर यह माना जाता है कि उन्हें यह नई व्यवस्था अपनी शक्तियों में कमी के तौर पर लगी।
चुनाव आयोग में झगड़े का इतिहास
जनवरी 1990 तक दो कमिश्नरों की नियुक्ति रद कर दी गई और चुनाव आयोग फिर से एक-सदस्यीय संस्था बन गई। 1993 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब इलेक्शन कमिश्नर एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति की नियुक्ति के साथ आयोग को फिर से बहु-सदस्यीय संस्था बना दिया गया। इसके बाद एक तरफ शेषन और दूसरी तरफ गिल और कृष्णमूर्ति के बीच लगातार झगड़ा चलता रहा।
'मेरे ऑफिस में दो गधे हैं'
शेषन इन नियुक्तियों को अपने पद की आजादी पर सीधा हमला मानते थे और उन्होंने दो नए कमिश्नरों को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया। उन्होंने गिल और कृष्णमूर्ति के साथ सरकारी दस्तावेज साझा करने से इनकार कर दिया, उन्हें जरूरी बैठकों में शामिल होने से रोका और उन्हें कोई भी दफ्तरी काम नहीं सौंपा। उन्होंने इंटरव्यू में चुनाव कमिश्नरों का खुलेआम मजाक उड़ाया और यहां तक कहा कि 'मेरे दफ्तर में दो गधे हैं'।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव आयोग को कई सदस्यों वाली संस्था बनाने के सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली शेषन की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में यह फैसला सुनाया था कि चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त का दर्जा, शक्तियां और फैसले लेने का अधिकार एक समान है और सीईसी सिर्फ बराबर वालों में सबसे पहला है।
गोपालस्वामी और नवीन चावला का विवाद
चुनाव आयोग के अंदरूनी झगड़ों में एक और मामला 2006 से 2009 के बीच तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच हुआ विवाद है। अपना कार्यकाल खत्म होने से कुछ महीने पहले गोपालस्वामी ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कांग्रेस के प्रति झुकाव के आधार पर चावला को हटाने की सिफारिश की।
राष्ट्रपति को भेजे अपने नोट में गोपालस्वामी ने आरोप लगाया कि चावला चुनाव आयोग की बैठकों की जानकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को दे रहे थे और ऐसा करने के लिए वे अक्सर आयोग की बैठकों के दौरान टॉयलेट ब्रेक लेते थे। हालांकि, मनमोहन सिंह सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश को ठुकरा दिया और उनके बाद चावला सीईसी बने।
2019 में क्या हुआ?
2019 के आम चुनावों के दौरान तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच मतभेद सामने आए थे। मीडिया रिपोर्ट्स में आरोप लगाया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन की शिकायतों से जुड़े मामलों में लवासा ने असहमति जताई थी, लेकिन आयोग ने उनकी असहमति को सार्वजनिक किए बिना ही उसे खारिज कर दिया था।
चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण दिया कि असहमति संबंधी नोट केवल आयोग द्वारा पारित अर्ध-न्यायिक आदेशों में ही सार्वजनिक किए जाते हैं। लवासा ने 18 अगस्त 2020 को अपना कार्यकाल पूरा होने से दो साल पहले ही इस्तीफा दे दिया और मनीला में मुख्यालय वाले एशियन डेवलपमेंट बैंक में वाइस-प्रेसिडेंट के तौर पर शामिल हो गए।
अरुण गोयल कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देने वाले पिछले चुनाव आयुक्त थे। हालांकि 9 मार्च 2024 के अपने इस्तीफे में उन्होंने निजी कारणों का हवाला दिया था, लेकिन व्यापक रूप से यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे।
No comments