पहले से शादीशुदा महिला ने लगाया शादी का झांसा देकर रेप का आरोप, केरल हाई कोर्ट ने केस किया रद्द

केरल हाई कोर्ट ने शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने से जुड़े एक केस में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर बाद में शादी नहीं हो पाती है, तो आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध अपराध नहीं माने जाएंगे.
जस्टिस जोबिन सेबस्टियन ने इस अहम मामले की सुनवाई की. उन्होंने 7 सितंबर के अपने आर्डर में कहा कि क्रिमिनल केस तभी बनेगा जब शुरू से ही इरादा धोखा देने का हो. अक्सर ब्रेकअप के बाद ऐसे मामले सामने आते हैं. पार्टनर पर शादी का झांसा देकर रेप का आरोप लगा दिया जाता है. लेकिन कोर्ट का कहना है कि सिर्फ वादा टूटने से पुराना कंसेंट या सहमति खत्म नहीं हो जाती. यह पूरा मामला एक ऐसी महिला का है जो पहले से शादीशुदा थी. ऐसे में कोर्ट ने पूरी स्थिति का एनालिसिस किया और आरोपी को बड़ी राहत देते हुए एफआईआर को ही रद्द कर दिया.
शादी का झांसा देकर सेक्स के मामले में कोर्ट ने एफआईआर को क्यों रद्द किया?
अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने शिकायतकर्ता से शादी का वादा किया था. इसके बाद दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए. सगाई होने के बाद वे पति-पत्नी की तरह लिव-इन में रहने लगे. महिला का आरोप था कि दो महीने की प्रेगनेंसी का पता चलने पर आरोपी बदल गया. उसने महिला से अबॉर्शन कराने को कहा और उसे धोखा दिया. इसी आधार पर महिला ने एफआईआर दर्ज कराई थी. लेकिन आरोपी ने कोर्ट में अपनी दलील पेश की. उसने कहा कि यह रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति से बना था. आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि जब दोनों का रिश्ता शुरू हुआ था तब महिला पहले से ही किसी और से शादीशुदा थी. उसका अपने पति से तलाक नहीं हुआ था. ऐसे में बीएनएस के तहत रेप या धोखे का केस नहीं बनता है.
पहले से शादीशुदा होने का इस क्रिमिनल केस और फैसले पर क्या असर पड़ा?
महिला के वकील ने कोर्ट में सफाई दी. उन्होंने कहा कि रिश्ता शुरू होने के समय महिला जरूर शादीशुदा थी लेकिन बाद में उसने तलाक ले लिया था. कोर्ट ने इस दलील का एनालिसिस किया. जज ने पाया कि जब आरोपी और महिला के बीच संबंध शुरू हुए तब महिला की शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी. कोर्ट ने कहा, 'इस फैक्चुअल बैकग्राउंड में यह आरोप बिल्कुल भी विश्वास करने लायक नहीं है कि महिला ने सिर्फ शादी के वादे पर सेक्स के लिए सहमति दी थी.' कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह कोई एक बार की घटना नहीं थी. दोनों ने अलग-अलग जगहों पर कई बार संबंध बनाए थे. महिला का तलाक लेना और फिर आरोपी से सगाई करना बाद की घटनाएं हैं. ये बातें यह साबित नहीं करतीं कि शुरुआत में सहमति धोखे से ली गई थी.
क्या अबॉर्शन के लिए कहना कानून की नजर में सीधे तौर पर चीटिंग माना जाएगा?
महिला ने अपनी शिकायत में यह भी कहा था कि प्रेगनेंसी के बाद आरोपी ने उसे अबॉर्शन के लिए मजबूर किया. उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ चीटिंग की है. कोर्ट ने इस प्वाइंट पर भी विस्तार से अपनी बात रखी. कोर्ट ने पाया कि सिर्फ यह कहना कि आरोपी ने धोखा दिया है, अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं है. कोर्ट ने साफ किया, 'एफआईआर में सिर्फ चीटिंग शब्द का इस्तेमाल करने से कोई अपराध नहीं बन जाता जब तक कि असल में कोई क्रिमिनल इंटेंट न दिखे.' कानूनी नजरिए से देखा जाए तो क्रिमिनल केस चलाने के लिए बुनियादी सबूत होना जरूरी है. इस केस में ऐसा कोई सबूत नहीं था जो यह बताए कि रिश्ते की शुरुआत से ही आरोपी का इरादा शादी न करने का था.
सहमति से बने संबंधों में क्रिमिनल लायबिलिटी तय करने का लीगल आधार क्या है?
हाई कोर्ट का यह जजमेंट उन तमाम मामलों के लिए एक नजीर है जहां ब्रेकअप के बाद रेप के केस दर्ज होते हैं. जस्टिस सेबस्टियन ने अपने आर्डर में एकदम स्पष्ट कर दिया है. किसी भी व्यक्ति को झूठे वादे के आधार पर तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब वादा शुरू से ही झूठा हो. इसका सीधा कनेक्शन महिला के फैसले से होना चाहिए. अगर रिश्ता सही तरीके से आगे बढ़ रहा है और किसी वजह से बाद में शादी नहीं हो पाती है. तो इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने सारे संबंध रेप की कैटेगरी में आ जाएंगे. आपसी सहमति से बना हर रिश्ता अपराध नहीं होता है. कोर्ट ने महसूस किया कि इस मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही से कोई फायदा नहीं होगा. इसी आधार पर कोर्ट ने एफआईआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया.
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