'लाश कहीं भी फेंक दो'... मां की मौत पर भी नहीं पसीजा बेटियों का दिल, वृद्धाश्रम में अपनों ने नहीं, गैरों ने किया अंतिम संस्कार
शुक्रवार रात मां ने दम तोड़ दिया। आश्रम प्रबंधन ने दामाद को फोन किया तो आने से साफ इनकार कर दिया।
अपनों के मुंह मोड़ने के बाद समाजसेवी संस्था मानव सेवा समिति ने वृद्धा का अंतिम संस्कार कर दिया। नरोत्तम राजपूत और शांति देवी ने तीनों बेटियों को नाज-नखरों से पाला। पढ़ा-लिखाकर तीनों की शादी कर दी। 10 वर्ष पूर्व नरोत्तम राजपूत का निधन हो गया और शांति देवी अकेली रह गईं। 2018 में मकान बेचकर रकम का बेटी व दामादों ने बंटवारा कर लिया।
कुछ दिन तो बेटियों ने अपने पास रखा और फिर घर से निकाल दिया। पुलिस ने लावारिस हालत में घूमतीं मिली शांति देवी को एटा वृद्धाश्रम भेज दिया गया। 2019 से वे कासगंज वृद्ध आश्रम में रह रहीं थी। दो माह पूर्व गिरने से उनका कूल्हा टूट गया। उनका उपचार चल रहा था। शुक्रवार रात उनका निधन हो गया।
कहीं भी फेंक दो लाश, हमसे कोई मतलब नहीं
आश्रम प्रबंधन के अनुसार शांति देवी की एक बेटी बरेली और दूसरी कासगंज में रहती हैं। बरेली में रहने वाली बेटी का फोन स्विच आफ मिला। दूसरी बेटी के पति गोपाल को फोन पर बताया तो उनका कहना था कि कहीं भी फेंक दो लाश, हमसे कोई मतलब नहीं। हम नहीं आएंगे।
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