Chamba: एंबुलेंस नहीं यहां पालकी से अस्पताल पहुंचाए जाते हैं मरीज

आजादी के सात दशक बाद बड़ोह गांव के लिए जश्न का दिन तो आया, लेकिन खुशी महज चंद दिनों की ही थी। सड़क की राह देख रहे लोग उस समय काफी खुश थे, जब सात मार्च 2019 को सड़क निर्माण के लिए भूमि पूजन हुआ, लेकिन एक साल बीतने के बाद सड़क के निर्माण की दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आई। आज भी हालत ऐसे हैं कि गांव से मरीजों को पालकी में बैठाकर अस्पताल पहुंचा जाता है। बहरहाल, इसे विडंबना ही कहें कि न तो एक वर्ष बाद बड़ोह के लिए सड़क बन पाई और न ही ग्रामीणों को पालकी से आजादी मिल सकी, जबकि, बड़ोह गांव के बीमार व्यक्ति की सांसों की रफ्तार पालकी पर निर्भर रहती है।
इतना ही नहीं सड़क निर्माण शुरू होने के बाद मलबा फेंके जाने से गांव की पैदल पगडंडी भी उबड़-खाबड़ हो चुकी है, जिससे बड़ोह गांव के निवासियों की मुश्किलें कम होने की बजाय बढ़ गई हैं। हालात ये हैं कि गांव में किसी के बीमार हो जाने अथवा गर्भवती महिला को आज भी पालकी में बिठाकर करीब डेढ़ किलोमीटर पगडंडी से होकर अस्पताल तक पहुंचाना पड़ता है, जबकि, गांव के करीब 40 बच्चे, जिनमें अधिकतर प्राथमिक पाठशाला के विद्यार्थी हैं, वे भी रोजाना तेज धूप व बरसात में पैदल सफर कर स्कूल आने जाने के लिए मजबूर हैं। शनिवार को भी गांव की एक बुजुर्ग महिला 65 वर्षीय विद्या देवी बीमार हो गई। बीमार महिला को उपचार के लिए स्वजनों को ग्रामीणों के सहयोग से पालकी में बैठाकर प्राथमिक अस्पताल बगढार तक पहुंचाना पड़ा।
बड़ोह गांव के निवासी इस तरह की परिस्थितियों से आए दिन जूझने के लिए मजबूर हैं। जिससे कि सरकार व लोक निर्माण विभाग के प्रति लोगों में रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना वन विभाग की क्लीयरेंस के ही आनन-फानन में गांव के लिए सड़क का भूमि पूजन कर जेसीबी लगाकर काम शुरू करवा दिया गया, लेकिन अदालत के आदेशों के बाद सड़क निर्माण बंद हो गया। यह सही है कि बड़ोह गांव के लिए सड़क का भूमि पूजन हुआ है। परंतु पूर्व में किए गए सड़क के सर्वे में काफी ज्यादा पेड़ आने से काम रुक गया था, जिसके बाद नए सिरे से सड़क निर्माण के लिए सर्वे किया गया है। सर्वे के अनुसार फोरेस्ट केस बनाया जा रहा है। फोरेस्ट क्लीयरेंस मिलते ही सड़क का निर्माण शुरु कर दिया जाएगा।
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