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लखनऊ में 1885 में बने मंदिर को डॉक्टर शाहिद ने 1993 में कब्जा कर इमारत बनवाई! अब कैसा है शिवालय?

 

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UP News: उत्तर प्रदेश के लखनऊ से बड़ी खबर सामने आ रही है. यहां विधानसभा मार्ग स्थित विधानसभा से 1km की दूरी पर स्थित इमारत के नीचे मंदिर होने की बात सामने आई है. दावा किया जा रहा है कि 30 साल पहले मंदिर को नीचे छुपाकर ऊपर इमारत का निर्माण कर दिया गया. नीचे बेसमेंट में मंदिर को रखा गया. बताया जा रहा है कि उस दौरान लोगों ने इसको लेकर पुलिस-प्रशासन से काफी शिकायत की थी. मगर कोई सुनवाई नहीं हुई.  

अब इस मामले को एक बार फिर उठाया गया है और लखनऊ पुलिस कमिश्नर रोशन जैकब को ज्ञापन सौंपा गया है. दावा किया गया है कि ये मंदिर गजराज सिंह ने साल 1885 में अपनी संपत्ति पर बनवाया था. मगर इस मंदिर को इमारत के नीचे छुपा दिया गया.

क्या है मंदिर का इतिहास?

इस मामले में मंदिर पक्ष के द्वारा दावा किया गया है कि यह मंदिर 1885 का है. इसे गजराज सिंह ने अपनी कमाई से अपनी जमीन पर बनवाया था. फिर साल 1906 में रजिस्टर्ड वसीयत कर उस जमीन पर एक ठाकुरद्वारा और शिवालय का निर्माण करवाय गया. साल 1918 में पूजा अर्चना के लिए एक ख्वाहिश नाम बनाया. उस समय द्वारका प्रसाद दीक्षित को यहां का पुजारी नियुक्त किया गया. इसी के साथ द्वारका प्रसाद दीक्षित के ही परिवार की पीढ़ियों को इस मंदिर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी सौंप दी गई.फिर साल 1993-43 में नेता डॉक्टर शाहिद ने कर लिया कब्जा

दावा है कि द्वारका प्रसाद के बाद लालता प्रसाद, फिर उमाशंकर दीक्षित, रामकृष्ण दीक्षित और आखिर में यज्ञ मनी दीक्षित ने यहां पूजा-पाठ की. यज्ञ मनी दीक्षित के बाद जब पूजा-पाठ की जिम्मेदारी रामकृष्ण दीक्षित को मिली तभी साल 1993-94 के बीच एक राजनीतिक दल से जुड़े नेता डॉक्टर शाहिद ने मंदिर पर कब्जा कर लिया.  

आरोप है कि इस दौरान नेता डॉक्टर शाहिद ने सरकारी संरक्षण में बिना नक्शा पास कराए भूमि पर अवैध निर्माण करवाया और यहां शॉपिंग कंपलेक्स के लिए दुकान का निर्माण करवा दिया. मंदिर पक्ष का कहना है कि इस इमारत के नीचे राधा-रानी का मंदिर, शिव मंदिर और बरगद का पेड़ है. दावा ये भी है कि यहां कुछ पुरानी दुकान भी हैं, जिनकी कमाई से मंदिर का खर्चा चलता था. हिंदू पक्ष का ये भी दावा है कि यहां एक प्राचीन बरगद का पेड़ भी था, जिसे काट दिया गया था.

मंदिर में की गई थी चोरी और तोड़फोड़

हिंदू पक्ष का कहना है कि 14 अगस्त साल 1994 में मंदिर में चोरी को लेकर केस भी दर्ज करवाया गया था. उस दौरान मंदिर से अष्टधातु की राधा कृष्ण की मूर्ति, सोने के आभूषण समेत कई सामान चोरी हुए थे और मंदिर में तोड़फोड़ भी की गई थी.

मंदिर को वापस पाने के लिए उस समय बनाई गई थी समिति

मंदिर पक्ष से जुड़े हुए लोगों ने दावा किया है कि उस दौरान उन्होंने नगर मजिस्ट्रेट लखनऊ से शिकायत की थी. यहां तक की 14 जनवरी 1993 को उन्होंने कैसरबाग और चौक सीओ को पत्र लिखकर निर्माण कार्य पर रोक लगाने के साथ ही साथ मंदिर परिसर में स्थित बरगद के पेड़ को भी काटने से रोकने की मांग की थी. मगर फिर भी किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की और पेड़ भी काट दिया गया और मंदिर को नीचे दबा दिया गया.

इसके बाद पंडित रामकृष्ण दीक्षित ने एक समिति रजिस्टर कराई. इसका नाम मीता दास गजराज सिंह मंदिर एवं भक्ति भावना जनहित एवं कार्य समिति रखा गया. तब से अब तक ये समिति ही मंदिर क अस्मिता बचाने और उसे वापस पाने के लिए जनजागरण अभियान चलाती है.

मंदिर अब कैसी हालत में है?

मंदिर को देखने के लिए जह हमारी टीम मौके पर गई तो ये मंदिर काफी प्राचीन पाया गया. इसके आस-पास कूड़ा और गंदगी ही गंदगी पड़ी हुई थी. मंदिर में जगह-जगह जाले लगे हुए थे. मगर मंदिर में शिवलिंग के ऊपर कुछ पुष्प भी चढ़े हुए थे. मंदिर की लड़ाई लड़ रहे पक्ष का दावा है कि संभल का मामला सामने आने के बाद खास समुदाय के लोगों ने यहां पुष्प चढ़ा दिए हैं. फिलहाल लखनऊ के इस मंदिर का मामला एक बार फिर चर्चाओं में आ गया है.

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