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“गोरे रंग पर न इतना गुमान कर…” सांवला रंग बना मौत की वजह, पत्नी ने 1 लाख में दी पति की सुपारी!

धार : साल 1974 में आई फिल्म ‘रोटी’ का मशहूर गीत— “गोरे रंग पर न इतना गुमान कर…”—आज भी उतना ही प्रासंगिक है, लेकिन अफसोस कि दशकों बाद भी समाज इसकी सीख को पूरी तरह नहीं समझ पाया। यही वजह है कि मध्य प्रदेश के धार से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जहां एक महिला ने अपने पति की हत्या सिर्फ इसलिए करवा दी क्योंकि उसे उसका सांवला रंग पसंद नहीं था। यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज में गहराई तक जड़ जमा चुके ‘रंगभेद’ यानी कलरिज़्म की भयावह तस्वीर पेश करती है।

धार जिले के राजोद थाना क्षेत्र में मिर्ची व्यापारी देवकृष्ण पुरोहित को उनकी पत्नी प्रियंका अक्सर उनके रंग को लेकर ताने देती थी। घरेलू कलह बढ़ने पर प्रियंका ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर एक लाख रुपये की सुपारी देकर पति की हत्या करवा दी। यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस मानसिकता का नतीजा है, जिसमें बाहरी सुंदरता को इंसान के चरित्र से ज्यादा महत्व दिया जाता है।

दरअसल, भारत में रंगभेद कोई नई समस्या नहीं है। यह हमारे सामाजिक ढांचे, विज्ञापनों, फिल्मों और यहां तक कि वैवाहिक वेबसाइटों में भी गहराई से मौजूद है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का स्किन केयर बाजार तेजी से बढ़ रहा है और इसका बड़ा हिस्सा उन उत्पादों पर टिका है जो ‘गोरापन’ या ‘स्किन लाइटनिंग’ का दावा करते हैं। यही नहीं, मैट्रिमोनियल साइट्स पर ‘फेयर’ स्किन टोन को प्राथमिकता देने का चलन लंबे समय तक रहा, हालांकि विरोध के बाद कुछ प्लेटफॉर्म्स को ऐसे फिल्टर हटाने पड़े।

आज हालात यह हैं कि लोग मेडिकल साइंस के जरिए भी अपनी त्वचा का रंग बदलने की कोशिश कर रहे हैं। स्किन क्लीनिकों में बड़ी संख्या में लोग केवल स्किन लाइटनिंग ट्रीटमेंट के लिए पहुंचते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘बॉडी इमेज एंग्जायटी’ का परिणाम है, जो समाज की बनाई हुई सुंदरता की परिभाषा से जन्म लेती है।

सरकार और नियामक संस्थाओं ने भी इस समस्या को देखते हुए भ्रामक विज्ञापनों पर सख्ती दिखाई है। ‘फेयर’ जैसे शब्दों पर रोक लगाने और कंपनियों को अपने प्रोडक्ट्स का नाम बदलने तक के निर्देश दिए गए। बावजूद इसके, विज्ञापनों का संदेश अब भी कहीं न कहीं वही है—गोरा रंग ही सफलता और आत्मविश्वास की कुंजी है।

असल सवाल यही है कि यह सोच बदलेगी कब? जब तक समाज ‘रंग’ से ज्यादा ‘चरित्र’ को महत्व देना नहीं सीखेगा, तब तक धार जैसी घटनाएं सामने आती रहेंगी। जरूरत है मानसिकता बदलने की—क्योंकि असली खूबसूरती चेहरे के रंग में नहीं, इंसान के विचार और व्यवहार में होती है।

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