दुल्हन ले जाएगी बरात, एक ही परिवार में होंगी छह शादियां – खारसी गांव में ऐतिहासिक आयोजन

चकराता : उत्तराखंड के जौनसार बावर क्षेत्र में एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है, जहां आमतौर पर दूल्हा बरात लेकर दुल्हन के घर जाता है, वहीं इस जनजातीय क्षेत्र में कहानी बिल्कुल उलटी है। यहां दुल्हन खुद बरात लेकर दूल्हे के घर पहुंचती है, जिसे स्थानीय भाषा में “जोजोड़े” परंपरा कहा जाता है। इसी खास परंपरा के तहत चकराता ब्लॉक के खारसी गांव में 29 अप्रैल को एक ऐसा विवाह समारोह होने जा रहा है, जो न सिर्फ परिवार के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि एक ही परिवार में पहली बार छह शादियां एक साथ संपन्न होने जा रही हैं।
खारसी गांव निवासी दौलत सिंह चौहान के परिवार में उनके पांच पुत्र — नरेंद्र, प्रीतम, राहुल, अमित और प्रदीप — के साथ-साथ उनकी पुत्री राधिका का विवाह भी एक ही समय पर किया जाएगा। इस सामूहिक विवाह को लेकर गांव में जबरदस्त उत्साह का माहौल है और स्थानीय लोग इसे जौनसार बावर की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने वाली ऐतिहासिक पहल के रूप में देख रहे हैं। संयुक्त परिवार की इस परंपरा में दादा, पिता और बेटों की कई पीढ़ियां एक ही छत के नीचे रहती हैं और एक ही चूल्हे पर भोजन करती हैं, ऐसे में यह सामूहिक विवाह परिवारिक एकता और सामाजिक समरसता का सुंदर उदाहरण बनकर सामने आ रहा है।
परिवार के मुखिया दौलत सिंह चौहान का कहना है कि एकल विवाह में जहां अलग-अलग शादियों पर लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं, वहीं सामूहिक विवाह से न केवल खर्च में भारी कमी आती है बल्कि सभी रस्में भी एक साथ और सादगीपूर्ण तरीके से पूरी हो जाती हैं। उन्होंने इस आयोजन को जौनसार बावर की सांस्कृतिक विरासत को संजोने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। इस आयोजन को लेकर गांव और आसपास के क्षेत्रों में भी खासा उत्साह देखने को मिल रहा है, क्योंकि लोग इसे सिर्फ एक विवाह नहीं बल्कि अपनी परंपरा और पहचान का उत्सव मान रहे हैं।
इसके साथ ही इस क्षेत्र में सामाजिक कार्यक्रमों में सादगी को लेकर भी एक अहम निर्णय लिया गया है। बीते वर्ष गांव में हुई एक बैठक में यह सहमति बनी थी कि विवाह और अन्य आयोजनों में दिखावे और फिजूलखर्ची को कम किया जाएगा। इसके तहत महिलाओं के आभूषणों की सीमा भी तय की गई है, जिसमें केवल कान की झुमकी, नाक की फूली, हाथ में अंगूठी और गले में मंगलसूत्र तक सीमित रहने का निर्णय लिया गया है। साथ ही महंगे आभूषणों के साथ-साथ अंग्रेजी शराब और बियर पर भी प्रतिबंध लगाया गया है, ताकि परंपरा के साथ-साथ सादगी और सामाजिक संतुलन भी बना रहे।
यह पूरा आयोजन इस बात का उदाहरण बन गया है कि आधुनिक दौर में भी अगर लोग चाहें तो अपनी परंपराओं, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को न सिर्फ बचा सकते हैं बल्कि उन्हें और मजबूत भी बना सकते हैं। जौनसार बावर की यह अनोखी परंपरा आज भी यह संदेश देती है कि संस्कृति केवल इतिहास नहीं होती, बल्कि जीने का एक तरीका होती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है।
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