“हम जज हैं, संसद नहीं जो नया कानून बना दें” – हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दिखाया आईना!.

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हेट स्पीच (नफरत फैलाने वाले भाषणों) पर रोक लगाने के लिए किसी भी तरह के अतिरिक्त निर्देश या नए दिशानिर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कानूनी ढांचा ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त है।
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें सांप्रदायिक हेट स्पीच के मामलों में अधिक न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई थी। इन याचिकाओं में ‘कोरोना जिहाद’, ‘यूपीएसएस जिहाद’ जैसे कथित भड़काऊ बयानों और धार्मिक सभाओं में दिए गए विवादित भाषणों का उल्लेख किया गया था।
अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों को लागू कराने के निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे न तो खुद कानून बना सकती हैं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून निर्माण का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास ही है।
पीठ ने यह भी कहा कि आपराधिक मामलों में अपराध तय करना और सजा निर्धारित करना पूरी तरह विधायिका का काम है। अदालतें केवल कानून के अनुपालन और उसके क्रियान्वयन पर नजर रख सकती हैं, न कि नए कानून थोप सकती हैं।
याचिकाकर्ताओं की उस दलील को भी खारिज कर दिया गया, जिसमें कहा गया था कि मौजूदा कानून हेट स्पीच से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी ढंग से लागू न होने की है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती, तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर सकते हैं और उसके बाद मजिस्ट्रेट या निजी शिकायत के जरिए आगे कार्रवाई कर सकते हैं।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें चाहें तो समाज में उभरती चुनौतियों को देखते हुए कानून में सुधार या नए प्रावधानों पर विचार कर सकती हैं, जिसमें विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट में सुझाए गए बदलाव भी शामिल हैं।
यह फैसला 2020 से लंबित उन याचिकाओं पर आया है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि मीडिया, सोशल मीडिया और धार्मिक मंचों के जरिए सांप्रदायिक हेट स्पीच फैलाई जा रही है।
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