Panchayat Elections 2026 : चुनाव से पहले इलेक्शन रूल्स बदले, राज्य सरकार ने किए दो संशोधन

हिमाचल में पंचायती राज चुनाव का शेड्यूल जारी होने से ठीक पहले राज्य सरकार ने इलेक्शन रूल्स बदले हैं। इनमें दो तरह के संशोधन किए जा रहे हैं। एक संशोधन वन भूमि कब्जे से संबंधित केस का है, जबकि दूसरा संशोधन जिला परिषद और बीडीसी अध्यक्ष के चुनाव में कोरम और समय सीमा को लेकर है।
राज्य सरकार से संशोधन को मंजूरी दे दी गई है और अब इसे लीगल स्क्रूटनी के लिए विधि विभाग को भेजा गया है। राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश पंचायती राज इलेक्शन रूल्स 1994 में दो संशोधन किए हंै। एक संशोधन के जरिए वन भूमि पर कब्जे की स्थिति में ऐसे परिवार भी चुनाव लड़ सकेंगे, जिनका आवेदन फॉरेस्ट राइट्स एक्ट की वन अधिकार समिति के पास लंबित है।
हिमाचल में यदि पिछली तीन पीढिय़ां यानी करीब 75 साल से किसी व्यक्ति के पास वन भूमि पर कब्जा है, तो वह इसे रेगुलर करने के लिए वन अधिकार कमेटी के पास आवेदन डाल सकता है। इसका अभियान राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने लगभग सभी जिलों में चलाया था, क्योंकि हिमाचल में लगभग सारी सरकारी भूमि वन भूमि की कैटेगरी में आती है, इसलिए बहुत से लोगों पर वन भूमि के अवैध कब्जे के मामले हैं।
ऐसे लोगों को राहत देने के लिए यह संशोधन किया जा रहा है। दूसरा संशोधन हिमाचल प्रदेश पंचायती राज इलेक्शन रूल्स की धारा 85 और 86 में है। नियम 85 में बीडीसी के चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का चुनाव होता है, जबकि रूल 86 में जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव रेगुलेट किया जाता है। इस चुनाव के लिए बैठक के कोरम और समय सीमा में संशोधन किया जा रहा है।
जिला परिषद में दूसरी बैठक के लिए जहां 10 दिन का प्रावधान है, उसको कम करके सात दिन किया जा रहा है। संशोधन का ड्राफ्ट नोटिफाई होने पर ही यह पता चलेगा कि किस तरह के बदलाव इस प्रक्रिया में होंगे। राज्य सरकार ने विधानसभा से बिल पारित कर पंचायती राज एक्ट में भी एक बदलाव किया है, जिसमें चिट्टा तस्करी के आरोपों से घिरे लोगों पर चुनाव लडऩे से प्रतिबंध लगाया जा रहा है। एक्ट का यह संशोधन गवर्नर की अनुमति के बाद लागू होगा। उम्मीद है कि ये भी इसी चुनाव में लागू हो जाएगा।
ससुर का अवैध कब्जा, तो बहु भी नहीं लड़ पाएगी चुनाव
पंचायती राज चुनाव में इस बार इससे पहले हो चुके संशोधन के जरिए एक और बदलाव कर दिया गया है। वन भूमि के अलावा यदि किसी भी तरह की सरकारी भूमि पर एल्क्रोचमेंट परिवार की है, तो भी चुनाव नहीं लड़ा जा सकेगा। यह प्रावधान पहले से था, लेकिन इस बार इसे और कड़ा करते हुए बहू को भी परिवार की परिभाषा में लाया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि सास या ससुर ने भी अवैध कब्जा किया हो तो बहू भी चुनाव नहीं लड़ पाएगी। पहले इस तरह के आरोपों से घिरे परिवार बहू को चुनाव लड़वा देते थे क्योंकि वह परिवार की परिभाषा में नहीं थी।
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