‘अपनी नौकरी खुद छीन रहें वर्कस’, AI को ट्रेन कर रहे मजदूर, अब खुद के रोजगार पर मंडराया खतरा!

Indian Workers Train Robots : भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक नई तकनीकी क्रांति तेजी से आकार ले रही है, लेकिन इसके साथ ही हजारों मजदूरों के सामने नौकरी छिनने का डर भी गहराता जा रहा है। फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक सिस्टम को ट्रेन करने के लिए अपने हर काम, हर मूवमेंट और हर हुनर को रिकॉर्ड कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया भविष्य में ऑटोमेशन को तेज कर सकती है, जिससे इंसानी श्रमिकों की जरूरत कम हो सकती है। यही वजह है कि कई मजदूर अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। एक टेक्नीशियन ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा,
“यह ऐसा है जैसे आप अपनी कब्र खुद खोद रहे हों… और उसे खुद ही तैयार भी कर रहे हों।”
क्या है ‘एगोसेंट्रिक डेटा’?
AI और रोबोट्स को इंसानों की तरह काम सिखाने के लिए कंपनियां अब “एगोसेंट्रिक डेटा” नाम की तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। इसमें मजदूर अपने सिर पर कैमरा लगाकर काम करते हैं, जिससे मशीनों को फर्स्ट-पर्सन व्यू में यह समझाया जा सके कि कोई इंसान किसी काम को कैसे करता है।
कपड़ा काटना, सिलाई करना, मशीन संभालना, धागों को सेट करना या कपड़े तह करना जैसे कामों की रिकॉर्डिंग AI सिस्टम को दी जा रही है। इसका उद्देश्य ऐसी मशीनें तैयार करना है जो बदलते माहौल में इंसानों की तरह निर्णय ले सकें और जटिल काम कर सकें।
‘एम्बोडीड इंटेलिजेंस’ की होड़
तकनीकी कंपनियां अब “एम्बोडीड इंटेलिजेंस” यानी इंसानों जैसी फिजिकल समझ रखने वाले AI सिस्टम विकसित करने में जुटी हैं। इसके लिए भारी मात्रा में इंसानी गतिविधियों का डेटा चाहिए।
विशेषज्ञों के मुताबिक, उन्नत AI मॉडल तैयार करने के लिए करीब 10 करोड़ से 100 करोड़ घंटे तक के इंसानी व्यवहार की रिकॉर्डिंग की जरूरत पड़ सकती है।
अब तक फैक्ट्रियों में रोबोट सिर्फ तय और दोहराए जाने वाले काम करते थे, लेकिन नई पीढ़ी के AI सिस्टम को ऐसे माहौल में काम करना सिखाया जा रहा है जहां हर पल परिस्थितियां बदलती रहती हैं।
भारत बना AI डेटा का बड़ा केंद्र
अमेरिका की AI डेटा सॉल्यूशन कंपनी Objectways भारत समेत कई देशों में बड़े पैमाने पर डेटा कलेक्शन कर रही है।
कंपनी फैक्ट्री मजदूरों से लेकर घरेलू काम करने वाले लोगों तक के काम रिकॉर्ड करवा रही है। खाना बनाना, कपड़े तह करना, मशीन ऑपरेट करना और सूक्ष्म हस्तकौशल वाले काम AI सिस्टम को सिखाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
भारत इस तरह के डेटा का बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। यहां काम करने वालों को प्रति घंटे करीब 250 से 350 रुपये तक भुगतान किया जा रहा है। कई कंपनियां मोबाइल ऐप के जरिए घर बैठे रिकॉर्डिंग करवाने की सुविधा भी दे रही हैं।
इसी क्षेत्र में काम कर रही कंपनी Humyn Labs ने वैश्विक डेटा कलेक्शन परियोजनाओं के लिए 20 मिलियन डॉलर तक का फंड उपलब्ध कराया है।
मजदूरों में बढ़ रही बेचैनी
हालांकि कंपनियां इसे तकनीकी विकास का जरूरी हिस्सा बता रही हैं, लेकिन मजदूरों में इसे लेकर चिंता बढ़ रही है।
कई श्रमिकों का कहना है कि उन्हें यह पूरी तरह नहीं बताया जाता कि उनके रिकॉर्ड किए गए डेटा का इस्तेमाल आखिर कहां और किस उद्देश्य के लिए होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक सवाल भी है। इंसानी हुनर और “मसल मेमोरी” को मशीनों में ट्रांसफर करना भविष्य में बड़े पैमाने पर रोजगार संकट पैदा कर सकता है।
कंपनियों का क्या कहना है?
इस क्षेत्र से जुड़े कई एग्जीक्यूटिव्स मानते हैं कि नौकरी जाने का डर पूरी तरह गलत नहीं है। हालांकि उनका कहना है कि रोबोट खतरनाक, दोहराए जाने वाले और कठिन काम संभाल सकते हैं, जिससे इंसानों को बेहतर और सुरक्षित नौकरियों में जाने का मौका मिलेगा।
लेकिन जमीनी स्तर पर काम कर रहे मजदूरों के लिए यह बदलाव उतना आसान नहीं दिख रहा। उन्हें डर है कि जिन मशीनों को वे आज ट्रेन कर रहे हैं, वही कल उनकी जगह ले सकती हैं।
तकनीक बनाम रोजगार की नई बहस
AI और ऑटोमेशन की यह दौड़ अब सिर्फ तकनीकी विकास की कहानी नहीं रह गई है। यह इंसानी रोजगार, श्रमिक अधिकार और डेटा के नैतिक इस्तेमाल पर नई बहस को जन्म दे रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में सरकारों और कंपनियों को यह तय करना होगा कि तकनीक और रोजगार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि विकास की कीमत लाखों लोगों की नौकरियों से न चुकानी पड़े।
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