मुस्लिम राजनीति के ‘सुलतान’ हुए बेअसर: बंगाल में ओवैसी-हुमायूं फेल, असम में अजमल का किला भी ढहा; समझें नया वोटिंग पैटर्न.

कोलकाता, गुवाहाटी : पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने देश की सियासत में कई नए अध्याय लिखे हैं, लेकिन सबसे बड़ा बदलाव मुस्लिम वोटिंग पैटर्न में देखने को मिला है। मुस्लिम सियासत के ‘पुरोधा’ कहे जाने वाले असदुद्दीन ओवैसी, बदरुद्दीन अजमल और हुमायूं कबीर जैसे दिग्गजों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है। किंगमेकर बनने का ख्वाब संजोए इन नेताओं के वजूद पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल: ओवैसी और हुमायूं कबीर का ‘धार्मिक कार्ड’ फेल
बंगाल चुनाव में टीएमसी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले ओवैसी और हुमायूं कबीर को करारी शिकस्त मिली है। मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर ने चुनाव से ठीक पहले ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) बनाकर बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मंदिर-मस्जिद की राजनीति करने की कोशिश की थी। उन्होंने ओवैसी की AIMIM के साथ हाथ मिलाया, लेकिन बंगाल के मुसलमानों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी पर ही भरोसा जताया।
- AIMIM का सूपड़ा साफ: ओवैसी की पार्टी का खाता तक नहीं खुला और उसे महज 0.10% वोट शेयर से संतोष करना पड़ा।
- हुमायूं कबीर का निजी प्रदर्शन: हुमायूं कबीर केवल उन दो सीटों (नौदा और रेजनीनगर) पर ही बढ़त बना सके जहां वे खुद लड़ रहे हैं, बाकी प्रदेश में उनकी पार्टी का कोई प्रभाव नहीं दिखा।
असम: बदरुद्दीन अजमल के ‘इत्र’ की खुशबू हुई बेअसर
असम में AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक करियर का सबसे बुरा दौर साबित हुआ है। कभी किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले अजमल की पार्टी इस बार महज 2 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 2021 में 16 सीटें जीतने वाली AIUDF का जनाधार गिरने के पीछे परिसीमन और कांग्रेस का दोबारा मजबूत होना बताया जा रहा है।
- कांग्रेस बनी पहली पसंद: असम के मुस्लिम मतदाताओं ने महसूस किया कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में छोटे दलों के बजाय कांग्रेस को वोट देना अधिक प्रभावी है।
- अजमल की साख पर सवाल: धुबरी से लोकसभा चुनाव हारने के बाद अब विधानसभा में भी अजमल का गिरता ग्राफ उनकी ‘मिया राजनीति’ के अंत का संकेत दे रहा है।
केरल और अन्य राज्य: एकजुट होकर भी मुस्लिम दलों से दूरी
केरल (27%), असम (34%) और पश्चिम बंगाल (30%) जैसे राज्यों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इन मतदाताओं ने भाजपा को रोकने के लिए एकजुट होकर मतदान तो किया, लेकिन मजहबी आधार वाली पार्टियों को ‘वोट कटवा’ मानकर किनारे कर दिया। मुस्लिम युवाओं ने इस बार ‘मजहबी जज्बात’ के बजाय ‘ठोस राजनीति’ और ‘धर्मनिरपेक्ष गठबंधनों’ (जैसे टीएमसी और कांग्रेस) को तरजीह दी।
क्यों धराशायी हुए ये दिग्गज?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम समुदाय अब ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ से ऊपर उठकर टिकाऊ राजनीति की ओर बढ़ रहा है।
- भाजपा का डर: मुस्लिम वोटर्स ने महसूस किया कि अलग-अलग धार्मिक पार्टियों को वोट देने से भाजपा के खिलाफ लड़ाई कमजोर होती है।
- स्थानीय पहचान: बंगाल में ओवैसी की ‘हैदराबादी राजनीति’ बंगाली मुसलमानों को नहीं भायी।
- वोट कटवा की छवि: छोटे दलों को भाजपा की ‘बी-टीम’ के रूप में देखे जाने का नुकसान इन नेताओं को उठाना पड़ा।
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