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ब्राह्मणों पर सियासी डोरे: 2027 के चुनाव से पहले अखिलेश और मायावती की रणनीति, क्या है यूपी का पूरा नंबर गेम?.

 

Lucknow : उत्तर प्रदेश की सियासत में साल 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। इस बार की चुनावी बिसात पर ब्राह्मण समुदाय एक बार फिर केंद्र बिंदु में आ गया है। अपनी पारंपरिक ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति के लिए पहचानी जाने वाली समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अब ‘पंडितों’ (ब्राह्मणों) को अपने पाले में लाने की नई कवायद शुरू की है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती भी अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर लौटती नजर आ रही हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सपा और बसपा का यह दांव भाजपा के मजबूत हिंदुत्व वोटबैंक में सेंध लगा पाएगा?

सपा का नया दांव: ‘पीडी’ का मतलब पंडित और जनेश्वर मिश्र की जयंती का सियासी संदेश

सपा मुखिया अखिलेश यादव ने पार्टी मुख्यालय पर पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन के दौरान बड़ा सियासी बयान देते हुए कहा कि ‘पीडीए’ के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ भी है, इसलिए पार्टी के एजेंडे में पंडित भी शामिल हैं। अखिलेश ने इस दौरान कानपुर के विकास दुबे के एनकाउंटर और अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृतियों की उपेक्षा जैसे मुद्दों के सहारे भाजपा को घेरने की कोशिश की। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह कोशिश अकारण नहीं है क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 फीसदी है, जो राज्य की लगभग 115 से 120 विधानसभा सीटों पर सीधा चुनावी असर रखती है। पूर्वांचल के कई जिलों में तो इनकी आबादी 20 फीसदी तक आंकी जाती है।

नब्बे के दशक से शुरू हुआ ब्राह्मण राजनीति का सफर

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में रामजन्मभूमि आंदोलन के समय कांग्रेस की नीतियों से नाराज होकर ब्राह्मणों ने बड़ी संख्या में कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा का रुख किया था। उसी दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुसलमानों का मजबूत समर्थन मिला, जिससे ‘यादव-मुसलमान’ समीकरण के आधार पर सपा की नींव मजबूत हुई।

इसके विपरीत, साल 2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने अगड़ी जातियों के विरोध की राजनीति को छोड़कर ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ का नारा दिया। मायावती ने “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है” जैसे नारों के साथ ब्राह्मणों को जोड़ा और साल 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। हालांकि, बाद में कानून-व्यवस्था, तुष्टीकरण और हिंदुत्व के मुद्दों पर नाराजगी के चलते ब्राह्मण एक बार फिर भाजपा के पाले में लौट आए, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रखर हिंदुत्ववादी छवि और बेहतर कानून-व्यवस्था ने उन्हें मजबूती से जोड़े रखा।

अखिलेश यादव की राह में क्या हैं बड़ी मुश्किलें?

यद्यपि अखिलेश यादव ने अयोध्या से पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित कर और परशुराम-विष्णु मंदिरों के निर्माण की बात कहकर ब्राह्मणों को रिझाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी राह इतनी आसान नहीं है:

  • हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का प्रभाव: विश्लेषकों का तर्क है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की जो धारा प्रवाहित हुई है, उससे वैचारिक रूप से जुड़ा ब्राह्मण मतदाता केवल कुछ स्थानीय नाराजगी के चलते इस पाले से विमुख नहीं हो सकता।
  • यादव-ब्राह्मण समीकरण का पेच: समाजवादी पार्टी के पारंपरिक कैडर (यादव) और ब्राह्मणों के बीच सामाजिक धरातल पर नेतृत्व और वर्चस्व का पुराना टकराव रहा है, जिसे पाटना आसान नहीं होगा।
  • पार्टी के भीतर का विरोधाभास: सपा के भीतर कुछ नेताओं के बयानों और हिंदुत्व विरोधी राजनीति की सीमाएं भी ब्राह्मण मतदाताओं को असहज कर सकती हैं।

मायावती की पुरानी रणनीति और उम्मीदवारों का चयन

बसपा सुप्रीमो मायावती भी इस रेस में पीछे नहीं हैं। उन्होंने अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को धार देते हुए आगामी चुनाव के लिए उम्मीदवारों के ऐलान में भी ब्राह्मण चेहरों को प्राथमिकता दी है। जालौन के माधवगढ़ से आशीष पांडेय जैसे ब्राह्मण चेहरे को पहला उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि बसपा एक बार फिर दलित-ब्राह्मण समीकरण के जरिए सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश करेगी।

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता हमेशा से किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं। जहां एक ओर भाजपा अपनी हिंदुत्व की ठोस जमीन और योगी सरकार के कामकाज के दम पर इस वर्ग को साधे रखने का दावा कर रही है, वहीं अखिलेश यादव और मायावती की कोशिशें इस वर्ग के भीतर मौजूद कथित असंतोष को भुनाने की हैं। आने वाले वक्त में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष का यह सियासी समीकरण भाजपा के किले में सेंध लगा पाता है या राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का यह रिश्ता यूं ही बरकरार रहता है।

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