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काशी का अद्भुत तिल भांडेश्वर महादेव मंदिर, हर मकर संक्रांति पर बढ़ता है शिवलिंग का आकार

सावन का पावन माह चल रहा है। ऐसे में शिवनगरी काशी, जहां की हर गली में शिव की महिमा गूंजती है, वहां कई मंदिर हैं, जो न केवल चमत्कार की कहानी कहते हैं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के रिश्ते को भी दिखाते हैं। बाबा विश्वनाथ के शहर बनारस में कई शिवालय हैं। इनमें कुछ शिवालय तो सदियों पुराने हैं। इस प्राचीन शहर में एक ऐसा चमत्कारिक शिवलिंग भी है, जिसका आकार हर साल बढ़ता है। शिव के इस अद्भुत धाम की कहानी जो भी सुनता है, वो यहां खींचा चला आता है। काशी के केदारेश्वर खंड में तिल भांडेश्वर महादेव का मंदिर है। 

इस मंदिर में सोमवार के अलावा सावन के महीने में भारी भीड़ होती है। पांडेय हवेली की गली में यह मंदिर स्थापित है। जमीन से करीब 60 फीट ऊपर भगवान शिव का ये धाम है। हाथ में दूध और बेलपत्र लेकर भक्त 30 से ज्यादा सीढ़ी चढक़र महादेव के इस चमत्कारिक धाम पहुंचते हैं। तब उन्हें बाबा के विशाल शिवलिंग के दर्शन होते हैं। हर साल मकर संक्रांति पर इस चमत्कारिक शिवलिंग का आकार 1 तिल बढ़ता है। अनादि काल से ऐसा चलता आ रहा है। यही वजह है कि यह शिवलिंग वर्तमान में इतना विशाल आकृति वाला है।

सभी ग्रहों की होती है शांति-मंदिर पुजारी के अनुसार इस शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा जमीन से 60 फुट ऊपर दिखता है, लेकिन इनका निचला भाग जमीन के भीतर से शुरू होता है। काशी का यह महाशिवलिंग स्वयंभू शिवलिंग है, जो खुद भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट हुआ था। इस शिवलिंग की पूजा से 9 ग्रह और 27 नक्षत्रों की शांति होती है। जिस भी मनुष्य की कुंडली में दोष होता है, वो यहां प्रत्येक सोमवार को दर्शन करता है, तो उसकी कुंडली के सारे दोष समाप्त हो जाते हैं। 

द्वापर युग से कनेक्शन- यह शिवलिंग काशी के केदार खंड में स्थित है, इसलिए जो भी भक्त यहां नियमित दर्शन करता है और भगवान शिव को जल अर्पित करता है, उसे भैरवी यातना से भी मुक्ति मिल जाती है और मनुष्य सीधे मोक्ष को प्राप्त करता है। बताते चलें कि इस शिवलिंग का कनेक्शन द्वापर युग से है।

ये है प्राचीन कथा- मंदिर से जुड़ी प्राचीन कथा के मुताबिक, इस जगह पर विभांडा ऋषि भगवान शिव का तप करते थे। तप के दौरान वो तिल और गंगाजल अपर्ण करते थे। एक बार घड़े में रखे उनके सारे तिल जमीन पर गिर पड़े, जिससे भगवान शिव प्रकट हो गए। इस शिवलिंग का प्राकट्य तिल से हुआ है, इसलिए यह शिवलिंग तिल के आकार के बराबर बढ़ता है। कथा ये भी है कि द्वापर युग में यह शिवलिंग हर रोज एक तिल के आकार में बढ़ता था, लेकिन कलियुग में यह शिवलिंग मकर संक्रांति के दिन एक तिल बढ़ता है, जिसका आभास मंदिर के पुजारी करते हैं।

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