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आखिरी सांस तक बेटे का इंतजार करती रही बुजुर्ग मां, मौत के बाद भी नहीं पहुंचा बेटा; समाजसेवियों ने किया अंतिम संस्कार..

आखिरी सांस तक बेटे का इंतजार करती रही बुजुर्ग मां, मौत के बाद भी नहीं पहुंचा बेटा; समाजसेवियों ने किया अंतिम संस्कार..

बस्ती: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक ऐसी मार्मिक घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत और पारिवारिक रिश्तों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 70 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला अपने बेटे का इंतजार करते-करते दुनिया से विदा हो गईं। दुखद बात यह रही कि उनकी मौत के बाद भी बेटा अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंचा। आखिरकार एक सामाजिक संस्था ने बेटे का फर्ज निभाते हुए पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया।

बेसहारा हालत में मिली थीं बुजुर्ग महिला

जानकारी के अनुसार, हर्रैया नगर पंचायत स्थित आसरा आवास में रहने वाली बुजुर्ग महिला और एक वृद्ध पुरुष कई दिनों से बिना भोजन और इलाज के असहाय अवस्था में पड़े थे। पड़ोसियों की सूचना मिलने पर सामाजिक संस्था ‘सेवा समर्पण भाव परिवार’ की टीम मौके पर पहुंची और पुलिस व स्वास्थ्य विभाग की मदद से दोनों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया।

अस्पताल में बेटे को पुकारती रहीं

अस्पताल में इलाज के दौरान बुजुर्ग महिला की हालत लगातार गंभीर बनी रही। संस्था के कार्यकर्ता उनकी देखभाल करते रहे, लेकिन उनकी जुबान पर बार-बार सिर्फ अपने बेटे का नाम था। हर बार दरवाजे की आहट सुनकर उन्हें उम्मीद होती कि बेटा उन्हें लेने आएगा, लेकिन उनका यह इंतजार कभी पूरा नहीं हो सका। 29 जुलाई को उन्होंने अस्पताल में अंतिम सांस ली।

पांच दिन तक नहीं पहुंचा कोई परिजन

महिला की मौत के बाद प्रशासन और समाजसेवी संस्था ने परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए कोई सामने नहीं आया। शव करीब पांच दिनों तक मर्चरी में रखा रहा, फिर भी बेटा या परिवार का कोई सदस्य अंतिम विदाई देने नहीं पहुंचा।

समाजसेवियों ने निभाया बेटे का फर्ज

जब कोई अपना नहीं आया, तब ‘सेवा समर्पण भाव परिवार’ संस्था ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली। संस्था के प्रमुख दिलीप पाण्डेय ने बस्ती के पौराणिक मुड़घाट पर वैदिक रीति-रिवाज से बुजुर्ग महिला को मुखाग्नि दी। इस दौरान संस्था के सदस्य और स्थानीय लोग भी मौजूद रहे। यह भावुक दृश्य देखकर कई लोगों की आंखें नम हो गईं।

समाज के सामने छोड़ गई कई सवाल

यह घटना सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जिस मां ने अपने बेटे के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर दी, उसे अंतिम समय में अपनों का साथ नहीं मिला। वहीं, एक सामाजिक संस्था ने यह संदेश दिया कि सच्चे रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और इंसानियत से भी बनते हैं।

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