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फंदे पर ही लटकेंगे दरिंदे! कम दर्दनाक मौत की याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज

 

Supreme Court Verdict on Hanging vs Lethal Injection: भारत में मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी पर लटकाने की दशकों पुरानी व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के फंदे की जगह कम दर्दनाक जानलेवा इंजेक्शन (Lethal Injection) या अन्य विकल्प अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनी और संवैधानिक ढांचे के तहत फांसी के जरिए मौत की सजा देने के तरीके को असंवैधानिक या अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मामले को बड़ी बेंच को भेजने से भी इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह साफ किया कि उसका यह फैसला भविष्य के लिए अंतिम रोक नहीं है, यदि केंद्र सरकार चाहे तो वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर दूसरे विकल्पों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की समिति बना सकती है।

याचिकाकर्ता की दलील: फांसी में लगते हैं 40 मिनट, इंजेक्शन से 5 मिनट में मौत

अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दाखिल इस जनहित याचिका (PIL) में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत दोषी को गर्दन से तब तक लटकाया जाता है जब तक कि उसकी मृत्यु न हो जाए। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का हवाला देते हुए तर्क दिया था:

  • दर्दनाक और अमानवीय: फांसी की प्रक्रिया में कैदी को अत्यधिक शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है और मौत की पुष्टि होने में करीब 40 मिनट लग जाते हैं।
  • त्वरित विकल्प: जानलेवा इंजेक्शन, गोली मारना (Firing Squad) या गैस चैंबर जैसे आधुनिक तरीकों से कैदी की मौत 5 मिनट के भीतर और कम से कम पीड़ा के साथ हो जाती है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानक: संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए दलील दी गई कि यदि कानून मौत की सजा देता है, तो उसे लागू करने का तरीका कम से कम पीड़ादायक और गरिमापूर्ण होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: मौजूदा व्यवस्था असंवैधानिक नहीं, पर भविष्य के रास्ते खुले

सुनवाई के दौरान ‘प्रोजेक्ट 39ए’ और विभिन्न पक्षों ने वैश्विक अनुभवों को अदालत के सामने रखा। अदालत ने पाया कि लेथल इंजेक्शन या अन्य प्रस्तावित विकल्पों में भी कई व्यावहारिक, चिकित्सकीय और कानूनी चुनौतियां हैं। कई देशों में इंजेक्शन की विफलता और अत्यधिक दर्द के मामले भी सामने आए हैं। इसके अलावा, पीठ ने फांसी की प्रक्रिया से जुड़े जल्लाद के मानसिक स्वास्थ्य जैसे मानवीय पहलुओं पर भी विचार किया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस याचिका को खारिज करने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि भविष्य के लिए संवैधानिक जांच के दरवाजे बंद हो गए हैं। यदि भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आते हैं, जो पुराने फैसलों के वैज्ञानिक आधार को बदलते हैं, तो इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जा सकता है।

केंद्र सरकार का पक्ष: पॉलिसी का मामला, एक्सपर्ट्स कर सकते हैं विचार

केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार मौत की सजा के वैकल्पिक तरीकों की संभावनाओं की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ स्तर पर विचार करने को तैयार है।

पूर्व की सुनवाइयों के दौरान कोर्ट के सामने यह सुझाव भी आया था कि क्या दोषियों को फांसी या इंजेक्शन में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जा सकता है? हालांकि, केंद्र ने अपने हलफनामे में इसे व्यावहारिक रूप से असंभव करार दिया था। केंद्र की दलील थी कि सजा देने का तरीका तय करना पूरी तरह से नीतिगत मामला है।

क्या बदलेगा आगे?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि जब तक संसद कानून में बदलाव नहीं करती या केंद्र सरकार किसी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर नया वैज्ञानिक तरीका अधिसूचित नहीं करती, तब तक भारत में दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी के फंदे पर ही लटकाया जाएगा।

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