हिमाचल में 1 घंटे तक बच्ची तड़पती रही...देखने नहीं आए डॉक्टर, नर्स बोली-5 मिनट में आ रहे, इलाज के दौरान मौत, परिजनों का हंगामा

चंबा. हिमाचल प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में व्यवस्थाओं का बुरा हाल है. चंबा जिले के पंडित जवाहरलाल नेहरू राजकीय मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में रविवार रात को डेढ़ वर्षीय बच्ची की उपचार के दौरान मौत हो गई. इसके बाद आक्रोशित स्वजनों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा करते हुए डाक्टरों और अस्पताल प्रबंधन पर उपचार में लापरवाही के आरोप लगाए.
मृतक बच्ची की पहचान उपमंडल चुराह की ग्राम पंचायत सेईकोठी के गांव नरवाड़ निवासी कृतिका (डेढ़ वर्ष), पुत्री कुलदीप सिंह के रूप में हुई है. पिता का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद बच्ची को समय पर उपचार नहीं मिला और टेस्ट व एक्सरे के लिए उन्हें भटकाया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि इंजेक्शन और भाप देने के बाद बच्ची अचेत हो गई और उसकी मौत हो गई.
बच्ची के पिता ने कहा कि इमरजैंसी में डॉक्टर ही तैनात नहीं था. बच्ची को देखने के लिए एक घंटे तक कोई डॉक्टर ही नहीं आया. पिता ने कहा कि नर्स कहती रही कि पांच मिनट में आ रहे हैं. बाद में एक महिला डॉक्टर आई थी. लेकिन तब तक दौर हो गई थी. मां ने रोते रोते अब मैं अपनी बेटी कहां से लाऊंगा. पिता ने कहा कि डॉक्टरों को किसी की नहीं पड़ी है. उन्हें दो लाख रुपये सैलरी मिल रही है. मां ने रोते रोते कहा कि इस अस्पताल को ताला लगा दो. ऐसे में अगर मरीज आगे जाएंगे तो कम कम से मरीजों की जान तो बचेगी. अस्पताल के बाहर परिजन रोते बिलखते अपनी दास्तां सुनाते रहे.
उधर, मेडिकल कालेज के एमएस डा. प्रदीप ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच कमेटी गठित करने की बात कही है. उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
पूर्व सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि इलाज के अभाव में एक बच्चे की मृत्यु से पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता है. दुर्भाग्य यह है कि सुक्खू सरकार में ऐसी घटनाएं आए दिन की बात हो गई है. इलाज में लापरवाही से मौत के कितने मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन सरकार सबक सीख कर सुधार करने को तैयार नहीं है। ऐसे मामलों में सरकार जवाबदेही तय करने के बजाय लीपापोती वाला रवैया अपना रही है. मुख्यमंत्री माननीय सुखविन्द्र सिंह सुक्खू जी को समझना चाहिए कि उनके झूठ बोलने और बड़े-बड़े भाषण की क़ीमत अब प्रदेश के लोगों को चुकानी पड़ रही है. जबकि नेशनल हेल्थ मिशन और केंद्र सरकार द्वारा भेजे गई धनराशि खर्च न कर पाने के कारण वापस की जा रही है. अपनी नाकामी को सरकार "व्यवस्था परिवर्तन" नाम दे रही है.
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