पत्नी ने गुस्से में पूछा- "आज पूरा दिन कहां थे?" पति बोला- "मां को लेने गया था". फिर बूढ़ी मां ने जो कहा, सबकी आंखें नम हो गईं..
मैंजैसे ही दरवाज़े पर पहुँचा, पत्नी चीखकर बोली, - "आज पूरा दिन कहाँ थे तुम? ऑफिस में भी पता किया, उन्होंने कहा तुम आज गए ही नहीं!"।
मैं थोड़ा हिचकिचाकर बोला, - "वो… मैं दरअसल…"।
पत्नी ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही गुस्से में कहा, - "बात मत घुमाओ! मैं सब समझती हूँ! और ये बैग? पुराने कपड़ों से भरा बैग कहाँ से लाए?"
मैंने एक लंबी साँस लेकर शांत स्वर में कहा, - "मैं गाँव गया था… माँ को लाने।"
पत्नी का चेहरा एक पल में बदल गया। आँखें फैल गईं। हैरानी और झुंझलाहट भरी आवाज़ में बोली, - "क्या कहा? तुम्हारी माँ? तुम उन्हें यहाँ ले आए?"
उसकी आँखों में जैसे आग जल रही थी। - "वो तुम्हारे भाई के घर पर तो थीं, वहीं रह सकती थीं! यहाँ फिर क्यों? इस छोटे से फ्लैट में, जहाँ बच्चे की किताबें रखने तक की जगह नहीं!"
मैंने धीरे से कहा, - "वहाँ अब उनका रहना संभव नहीं था।"
पत्नी गुस्से से काँपते हुए बोली, - "यहाँ क्या स्वर्ग है? सात हज़ार रुपये में घर चलाती हूँ, बच्चे की फीस, बाज़ार, बिल-सब कुछ का बोझ मेरे ऊपर है! अब एक बुज़ुर्ग और?"
पत्नी की बातों के बीच कमरे के कोने में सफेद साड़ी पहने मेरी बूढ़ी माँ काँपते हाथों से चेहरा ढककर रो रही थीं। उनकी आँखों में आँसू थे, चेहरे पर शर्म और बेबसी साफ झलक रही थी।
मैंने धीमे स्वर में कहा, - "भाई और भाभी ने उन्हें घर से निकाल दिया। इसलिए मैं खुद जाकर उन्हें ले आया।"
पत्नी अभी भी गुस्से में थी, लेकिन अचानक माँ का चेहरा देखकर ठिठक गई। उसकी आँखें फैल गईं, होंठ काँप उठे- - "माँ… तुम?"
बूढ़ी माँ ने चेहरा उठाकर देखा। आँखों में थकान, चेहरे पर दर्द। धीरे से बोलीं, - "हाँ बेटी, तेरे भाई और बहू ने कहा कि मैं उन पर बोझ बन गई हूँ। अब बता, कहाँ जाऊँ?"
पत्नी के मुँह से अब एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। हाथ काँप रहे थे, आँखों से आँसू बह रहे थे। वह मेरी तरफ देखकर फुसफुसाई, - "तुमने पहले बताया क्यों नहीं? माँ तो माँ होती है, तुम्हारी हो या मेरी-माँ तो एक ही होती है!"
कमरे की हवा जैसे एक पल के लिए थम गई।
बूढ़ी माँ ने धीरे से कहा, - "नहीं बेटी, मैं यहाँ नहीं रहूँगी। मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आओ।"
हम सब एक साथ चौंक पड़े। पत्नी अविश्वास से बोली, - "माँ! आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
माँ काँपती आवाज़ में बोलीं, - "जिस घर में एक माँ को जगह नहीं मिलती, वहाँ दूसरी माँ का रहना भी ठीक नहीं। मैं जानती हूँ, मैंने सिर्फ एक बेटा ही नहीं, एक बेटी भी पैदा की है-जो आज अपनी माँ की जगह समझ नहीं पा रही। इसलिए मेरे रहने की सही जगह वृद्धाश्रम ही है।"
उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ गहरी शांति और अथाह पीड़ा थी।
उन्होंने आगे कहा, - "लेकिन एक बात हमेशा याद रखना बेटी, समय बहुत कठोर न्यायाधीश होता है। आज जैसे मैं बोझ बन गई हूँ, कल शायद तुम भी किसी की नज़रों में बोझ बन जाओ। तब समझोगी कि एक माँ का दिल कितना बड़ा होता है, जो अपने बच्चों को हर हाल में माफ कर देती है।"
पत्नी की आँखों से आँसू लगातार बहने लगे। वह ज़मीन पर बैठ गई, माँ के पैरों पर सिर रखकर रोते हुए बोली, - "माँ, मुझे माफ कर दो। मैं समझ नहीं पाई कि माँ सिर्फ बच्चे को जन्म नहीं देती, वह पूरे घर को जीवित रखती है।"
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और काँपती आवाज़ में कहा, - "माफ करने जैसा कुछ नहीं बेटी। समय ही सब सिखा देता है। माँ तो आखिर माँ ही रहती है-उसे बस अपने बच्चों की खुशी चाहिए।"
कमरे में अब सिर्फ रोने की आवाज़ थी। बाहर बारिश की बूंदें टप-टप गिर रही थीं, जैसे आसमान भी उस भूली हुई माँ के लिए रो रहा हो।
सच तो यह है, जिस घर में माँ के लिए जगह नहीं होती, उस घर में कभी सच्ची शांति नहीं बसती। माँ सिर्फ एक इंसान नहीं होतीं-वह आशीर्वाद होती हैं, घर की आत्मा होती हैं।

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