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बेटे के हत्यारे को पिता ने गले लगा लिया! कितना बड़ा होता है मन का अंधेरा

बेटे के हत्यारे को पिता ने गले लगा लिया! कितना बड़ा होता है मन का अंधेरा


अप्रैल 2015 में 22 साल का एक युवक पिज्जा पहुंचाने का काम कर रहा था. अमेरिका के लेक्सिंगटन, केंटकी में उसी दौरान उसे लूट लिया गया और चाकू मारकर उसकी हत्या कर दी गई. उसके परिवार के घर में वह सन्नाटा रह गया, जो तब आता है जब कोई जवान बेटा घर लौटकर नहीं आता.


दो साल बाद उस मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा सुनाए जाने के समय उसके पिता अदालत में खड़े थे.

हर कोई समझ सकता था कि एक पिता के भीतर कितना गुस्सा होगा. नफरत स्वाभाविक लगती. बदला लेना भी इंसानी प्रतिक्रिया होती, लेकिन पिता ने केवल सजा की बात नहीं की. उन्होंने उस अंधेरे की बात की, जो दूसरे आदमी के मन में आया था और जिसने उसे एक पल के लिए यह मानने पर मजबूर कर दिया कि किसी दूसरे इंसान की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्हें उस आदमी से गुस्सा नहीं है. उनका गुस्सा उस अंधेरे से है. फिर वो रोते हुए उस युवक के पास गए और उसे गले लगा लिया.

अगर हम इसे केवल माफी समझेंगे, तो शायद इस घटना को पूरी तरह नहीं समझ पाएंगे. उस पिता ने यह नहीं कहा था कि अपराध छोटा था. उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो हुआ उसे भूल जाना चाहिए. उनका बेटा वापस नहीं आ सकता था. वो बस अपने भीतर यह तय कर रहे थे कि अब आगे क्या होगा. उस अपराध ने पहले ही एक जिंदगी छीन ली थी. वो नहीं चाहते थे कि वही अपराध उनके भीतर से भी उनकी बाकी जिंदगी छीन ले. चोट और हमारी प्रतिक्रिया के बीच कहीं एक बहुत छोटी-सी जगह होती है. उसी जगह में इंसान के पास यह चुनने की ताकत बची रहती है कि वह आगे कैसा इंसान बनना चाहता है.

‘हमारा मन बहुत चतुर है’

हम अक्सर सोचते हैं कि बुराई बहुत बड़ी और डरावनी चीज होती है. चाकू, मुट्ठी, चीख या हिंसा जैसा कोई चेहरा, लेकिन अंधेरा हमेशा शोर करके नहीं आता. कभी-कभी वह एक छोटे-से विचार के रूप में आता है. ‘उसे सबक सिखाना चाहिए’, ‘उसने मेरे साथ ऐसा किया है, इसलिए मैं भी कर सकता हूं’, ‘मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगा’, ‘उसने इसकी शुरुआत की थी’, ‘मैंने बहुत सह लिया है’, हमारा मन बहुत चतुर है. वह हमारे लिए ऐसी कहानी बना सकता है, जिसमें हम हमेशा सही होते हैं और दूसरा हमेशा गलत. फिर हम उसी कहानी को बार-बार दोहराते रहते हैं, जब तक हमारा गुस्सा हमें न्याय जैसा लगने न लगे.

यहीं से यह कहानी अदालत से निकलकर हमारे अपने घर में आ जाती है. एक बच्चा नाराज है, क्योंकि दूसरे बच्चे ने उसका खिलौना ले लिया. पति या पत्नी को दस साल पहले कही गई एक बात आज भी याद है. किसी को लगता है कि उसके काम का श्रेय किसी और को मिल गया. कोई पुराना दोस्त फोन करना बंद कर देता है और हम उस खामोशी के अपने-अपने मतलब निकालते रहते हैं. घटना शायद पांच मिनट की थी, लेकिन मन उसे बीस साल तक जिंदा रख सकता है. सबसे अजीब बात यह है कि जिसने हमें दुख दिया, वह शायद बहुत आगे बढ़ चुका है, लेकिन हम उसी पुराने घर में रहते रहते हैं, जो अब कहीं है ही नहीं.

हमारे हाथ में नहीं मन के हर विचार

दुनिया की बहुत-सी पुरानी समझ हमें एक बात बताती है. हमारे मन में हर विचार का आ जाना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन किस विचार को हम अपने पास रखते हैं, किसे बार-बार सोचते हैं और किसे अपने जीवन का हिस्सा बनने देते हैं, इसमें हमारी भूमिका जरूर है. आज मनोविज्ञान इसे अलग-अलग नामों से समझाता है. पुराने ज्ञान ने इसे अलग भाषा में देखा था. बात फिर भी एक ही है. हर विचार को हम रोक नहीं सकते, लेकिन जब हम किसी विचार को बार-बार बुलाते हैं, उसे जगह देते हैं, उसे मजबूत करते हैं और आखिर में उसे अपने जीवन की दिशा सौंप देते हैं, तब वह केवल विचार नहीं रहता.

हमारे भीतर जैसे दो आवाजें बैठी होती हैं. एक कहती है, ‘जवाब दो. उसे छोड़ना मत’. दूसरी धीरे से पूछती है, ‘एक बार रुककर सोचो. इससे तुम्हारे भीतर क्या बचेगा?’. पहली आवाज उस पल को जीतना चाहती है. दूसरी पूरी जिंदगी को देखती है. पहली पूछती है, ‘उसने क्या किया?’ दूसरी पूछती है, ‘मैं क्या बन रहा हूं?’. दोनों आवाजें सही जैसी लग सकती हैं. फर्क इतना है कि एक आज का हिसाब चाहती है और दूसरी आने वाले कल की कीमत समझती है.

गलत काम के बाद भी बदल सकता है इंसान

शायद इसीलिए उस पिता का फैसला इतना गहरा है. उनके पास नफरत करने का पूरा कारण था. कोई उन्हें दोष नहीं देता. फिर भी उन्होंने उस आदमी के किए काम और उस आदमी के पूरे अस्तित्व को एक नहीं माना. यह आसान नहीं है. इसका मतलब यह नहीं कि अपराध के परिणाम नहीं होंगे. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि एक गलत काम के बाद भी इंसान के भीतर बदलने की संभावना खत्म नहीं होती. सजा पूछती है, ‘क्या हुआ?’. बदलाव पूछता है, ‘अब आगे क्या होगा?’.

अगली बार जब गुस्सा आए, तो एक छोटा-सा प्रयोग कर सकते हैं. जवाब देने से पहले, फोन करने से पहले, वह संदेश भेजने से पहले जिसे बाद में वापस नहीं लिया जा सकता, खुद से एक सवाल पूछें: ‘अगर मैं इस विचार को एक साल और पालता रहा, तो मैं कैसा इंसान बन जाऊंगा?’. यह बहुत छोटा सवाल है, लेकिन यह भावना और व्यवहार के बीच थोड़ी-सी जगह बना देता है. कभी वह जगह केवल एक सांस जितनी होती है. कभी वही जगह पूरी जिंदगी बचा लेती है.

आजादी का सबसे शांत रूप क्या है?

वह पिता अदालत से अपने बेटे के बिना बाहर निकले. यह बदला नहीं जा सकता था, लेकिन उन्होंने दूसरे आदमी का अंधेरा अपने भीतर लेकर बाहर निकलने से इनकार कर दिया. शायद यही आजादी का सबसे शांत रूप है. किसी दूसरे के सबसे बुरे क्षण को अपनी पूरी जिंदगी की पहचान न बनने देना. और शायद सवाल यह नहीं है कि अंधेरा हमारे बाहर कहीं है या नहीं. सवाल यह है कि आज हम अपने भीतर किस विचार को पाल रहे हैं, जो कल हमारा ही रूप बन सकता है? 

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