Himachal: कोरोना वायरस ने बिगाड़ी दवा कंपनियों की सेहत

बीबीएन – चीन में कहर ढा रहे कोरोना वायरस ने भारत की फार्मा कंपनियों की भी सेहत बिगाड़ दी है। दरअसल दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल चीन से आता है और कोरोना वायरस की वजह से इसकी आपूर्ति ठप पड़ गई है। हालात यह है कि देश में दवा कंपनियों सहित बल्क ड्रग डीलर्स के पास एक्टिव फार्मास्यूटिकल इन्ग्रेडिएंट (एपीआई) का नाम मात्र स्टाक ही बचा है। अगर चीन में एपीआई निर्माता इकाइयों में उत्पादन कुछ और दिन बंद रहता है तो देश में दवा संकट पैदा हो सकता है। एशिया का फार्मा हब कहे जाने वाले हिमाचल में दवा उद्योगों के पास फिलहाल अतिरिक्त इन्वेंटरी है, लेकिन फरवरी के तीसरे हफ्ते से दिक्कत शुरू हो सकती है। अगर इस समय तक आपूर्ति बाधित रही तो दवा बाजार के 70 फीसदी हिस्से पर इसका असर देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में चीन से 67 तरह के एपीआई की आपूर्ति होती है। जानकारों के अनुसार ऐसे में बीपी, डायबिटीज, सहित अन्य दवाओं की किल्लत होने के आसार हैं। यहां तक कि एंटिबायोटिक, पैरासिटामॉल जैसी कॉमन मेडिसिन की भी बाजार में किल्लत हो सकती है। गौरतलब है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक देश है और एपीआई के लिए भारत चीन पर निर्भर है। करीब 70 फीसदी से ज्यादा एपीआई सीधे तौर पर चीन से ही आता हैं। फिलवक्त एपीआई की आपूर्ति ठप पड़ने से जहां दवा उद्योग लड़खड़ाने लगे है, वहीं बल्कड्रग डीलर्स द्वारा हालात का फायदा उठाते हुए एपीआई की कीमतों में मनमर्जी से बेतहाशा बढ़ोतरी की जा रही है, जिससे दवा निर्माताओं के आगे संकट और गहरा गया है। दवा निर्माताओं के लिए एपीआई की किल्लत के बीच एक दिक्कत यह भी है कि डीपीसीओ के तहत जिन आवश्यक दवाओं को सूचीबद्ध किया गया है, उनके रॉ मटीरियल को डीपीसीओ के अधीन नहीं लाया गया है। यही वजह रही है कि एपीआई किल्लत के बीच इन दवाओं के रॉ मटीरियल की कीमतों में 30 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो गई है। गौर हो कि हिमाचल प्रदेश में फार्मा कंपनियों का सालाना कारोबार 30 हजार करोड़ से ज्यादा का है, जिसमें से 15 हजार करोड़ की दवाइयों का निर्यात किया जा रहा है। हिमाचल में करीब सात सौ दवा निर्माण इकाइयों सहित 200 से ज्यादा निर्यात उन्मुख इकाइयां उत्पादन में हैं। फार्मूलेशन आधारित ये उद्योग ज्यादातर बल्क ड्रग चाइना, आंध्र प्रदेश, गुजरात से मंगवाते हैं। बतातें चलें कि देश की हर तीसरी दवा यहां बन रही है। इसी बीच, एपीआई किल्लत के मामले की गंभीरता को भांपते हुए केंद्र सरकार भी हरकत में आ गई है। इसी कड़ी में ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने एपीआई के घरेलू निर्माताओं सहित आयात किए गए एपीआई का बीते दो साल का डाटा तलब किया है। इसके अलावा हालात से निपटने के लिए एपीआई के ताजा स्टाक की भी जानकारी मंगवा ली है।
डीपीसीओ के तहत लाया जाए रॉ मटीरियल
हिमाचल दवा निर्माता संघ के अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने कहा कि रॉ मटीरियल की किल्लत से दवा उद्योगों के लिए दवा उत्पादन करना संभव नहीं हो पा रहा है। एचडीएमए ने केंद्र के समक्ष बल्क ड्रग एपीआई की आपूर्ति के ज्वलंत मसले को उठाया है और डीपीसीओ (ड्रग प्राइज कंट्रोल ऑर्डर) के तहत आने वाली दवाओं के रॉ मटीरियल को भी डीपीसीओ के तहत लाने क ी मांग की गई है।
कच्चे माल के दामों में बेतहाशा वृद्धि
हिमाचल दवा निर्माता संघ के सलाहकार एवं दवा निर्माता एसएल सिंगला ने कहा कि फार्मा इंडस्ट्री के लिए जरूरी एपीआई की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो गई है। अकेले पैरासिटामॉल की कीमत करीब 300 रुपए प्रति किलो बढ़ गई है और निमेसुलाइड की कीमत तो दोगुने से ज्यादा बढ़ गई है। सर्दी-खांसी और बैक्टीरिया इन्फेक्शन के लिए जरूरी एपीआई भी काफी महंगे हो गए हैं। फरवरी के आखिरी तक अगर हालात नहीं सुधरते हैं तो इंडस्ट्री के लिए मुसीबतें काफी बढ़ सकती हैं।
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