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एटा आंगनवाड़ी भर्ती में बड़ा खेल : पहले बांटे नियुक्ति पत्र, फिर इस्तीफा देने का बनाया दबाव; जांच कमेटी पर उठे सवाल.

 

एटा : आंगनवाड़ी सहायिका भर्ती प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ताजा प्रकरण में दो महिलाओं को पहले विधिवत नियुक्ति पत्र देकर जॉइन कराया गया, बैंक खाते खुलवाए गए और सभी औपचारिकताएं पूरी कराई गईं। लेकिन कुछ ही दिनों बाद कथित रूप से दबाव बनाकर उनसे इस्तीफा लिखवा लिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित महिलाओं का कहना है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे सक्षम न्यायालय की शरण लेंगी।

ग्राम पंचायत गलत बताकर हटाया

सकीट ब्लॉक के ग्राम छछैना केंद्र पर मंजू राठौर का चयन आंगनवाड़ी सहायिका पद पर हुआ था। उन्हें नियुक्ति पत्र जारी कर जॉइनिंग कराई गई और बैंक खाता तक खुलवाया गया।

आरोप है कि जॉइनिंग के बाद अधिकारियों ने यह कहते हुए नियुक्ति निरस्त कर दी कि उनका निवास दूसरी ग्राम पंचायत में है। इसके बाद उन पर दबाव बनाकर इस्तीफा लिखवा लिया गया।

मंजू के पति उमेश ने बताया कि वे कई दिनों से विकास भवन के चक्कर काट रहे हैं। उनका सवाल है कि यदि ग्राम पंचायत को लेकर आपत्ति थी तो नियुक्ति पत्र जारी करने से पहले जांच क्यों नहीं की गई।

योग्यता पर सवाल, फिर भी पहले चयन

दूसरा मामला मारहरा ब्लॉक की ग्राम पंचायत सरनऊ (नगला मानधाती) का है, जहां दामिनी पत्नी रवि कुमार को भी करीब 20 दिन पहले नियुक्ति पत्र दिया गया था।

बाद में अधिकारियों ने यह कहते हुए चयन रद्द कर दिया कि उनके पास इंटरमीडिएट (कक्षा 12) का प्रमाण पत्र नहीं है। इस मामले में भी आरोप है कि उन पर दबाव बनाकर इस्तीफा लिखवाया गया।

जांच कमेटी की भूमिका पर संदेह

दोनों मामलों में जांच कमेटी की कार्यप्रणाली कटघरे में है। नियमों के अनुसार आवेदन में किसी भी त्रुटि को प्रारंभिक जांच में ही पकड़ा जाना चाहिए था, लेकिन यहां पहले चयन और नियुक्ति के बाद खामियां निकाली गईं।

इससे यह आशंका जताई जा रही है कि या तो जांच में गंभीर लापरवाही हुई या फिर जानबूझकर अनियमितताओं को नजरअंदाज किया गया। स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि जांच कमेटी के सदस्यों को निलंबित कर निष्पक्ष जांच कराई जाए।

पहले भी कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला

पहले भी इसी तरह का मामला सामने आया था, जब एक अयोग्य अभ्यर्थी को जीआईसी में प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया था। बाद में नियुक्ति निरस्त होने पर मामला कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने अभ्यर्थी के पक्ष में फैसला देते हुए नियुक्ति बहाल करने के आदेश दिए थे।

इससे साफ है कि प्रशासनिक लापरवाही के ऐसे मामले न्यायालय तक पहुंचकर सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं।

क्या बोले जिम्मेदार अधिकारी

जिला कार्यक्रम अधिकारी संजय सिंह ने बताया कि:

  • मंजू राठौर का चयन ग्राम पंचायत अलग होने के कारण निरस्त किया गया।
  • दामिनी का चयन शैक्षिक योग्यता अधूरी होने के कारण रद्द किया गया।

हालांकि, जांच कमेटी की भूमिका पर पूछे गए सवालों का वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

भास्कर का सवाल

  • आवेदन में कमी थी तो चयन कैसे हुआ?
  • जांच कमेटी ने शुरुआत में खामियां क्यों नहीं पकड़ीं?
  • नियुक्ति के बाद इस्तीफा क्यों लिया गया?
  • क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?

एटा का यह मामला सिर्फ एक भर्ती विवाद नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर खामियों का संकेत है। यदि समय रहते पारदर्शी जांच और कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला बड़ा घोटाला बन सकता है।

अब देखना यह है कि प्रशासन सख्ती दिखाता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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