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शराब के जाम में घुला ज़हर और लहूलुहान हुई दोस्ती : चंद रुपयों की ख़ातिर जब दोस्त ही बन गए दोस्त के कातिल.

 

शराब के जाम में घुला ज़हर और लहूलुहान हुई दोस्ती : चंद रुपयों की ख़ातिर जब दोस्त ही बन गए दोस्त के कातिल

जयपुर। जिस दोस्ती की कसमें कभी साथ बैठकर खाई जाती थीं, जिस महफ़िल में कभी हंसी के ठहाके गूंजते थे, उसी दोस्ती ने सोमवार तड़के कानोता की सुनसान सड़क पर इंसानियत और भरोसे का ऐसा कत्ल किया जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए।

महज़ 26 साल का रोहित सैनी-जिसकी आंखों में अपनी पत्नी और दो मासूम बच्चों के बेहतर मुस्तकबिल के सपने थे, जो अपने खून-पसीने की कमाई (सैलरी) के बाकी पैसे मांग रहा था-उसे क्या पता था कि जिन साथियों के साथ वह शाम को बैठा था, वही रात ढलते-ढलते उसकी जान के प्यासे भेड़िए बन जाएंगे।
शराब की खुमारी और झूठी शान: जहां इंसानी रिश्ते कौड़ियों के भाव बिक गएयह वारदात सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि युवा पीढ़ी में तेज़ी से पसरती नशे की अंधी सनक और विकृत अहंकार का वीभत्स चेहरा है।
दोस्ती पर भारी पड़ा शराब का नशा: रविवार रात तक जो युवक एक साथ बैठकर जाम छलका रहे थे, नशा सिर चढ़ते ही उनके भीतर का वहशी जाग उठा। चंद रुपयों का तकाजा और मालिक के प्रति चाटुकारिता का ऐसा घिनौना प्रदर्शन कि इंसान की ज़िंदगी की कोई कीमत ही न बची।
अहंकार की अंधी इंतहा: विवाद के बाद जब रोहित अपने साथी के साथ सोने चला गया था, तो रात के एक बजे फोन पर गालियां देकर पेट्रोल पंप पर बुलाना और फिर घात लगाकर हमला करना यह साबित करता है कि यह महज़ एक क्षणिक गुस्सा नहीं, बल्कि क्रूरता की योजना थी।
निर्दयता का पराकाष्ठा: पहले लाठियों से बेरहमी से सिर फोड़ना और जब वह निढाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा, तो बिना किसी रहम के उसके ऊपर भारी-भरकम कार दौड़ा देना-क्या इसे दोस्तों की लड़ाई कहा जा सकता है? यह सीधे तौर पर इंसानियत का कुचला जाना है।
उजड़ गया एक बेकसूर का हंसता-खेलता आशियाना
रोहित सिर्फ एक ड्राइवर नहीं था, वह अपने बूढ़े मां-बाप का सहारा, अपनी पत्नी का सिंदूर और अपने दो नन्हे बच्चों की पूरी दुनिया था। छुट्टी मिलने पर जो बाप अपने बच्चों के लिए खिलौने और खुशियां लेकर घर लौटता था, आज उसकी लहूलुहान लाश देखकर चौमूं के दुल्हा सिंह की ढाणी का हर शख्स स्तब्ध और रो रहा है।
वे मासूम बच्चे अब पूरी ज़िंदगी इस सवाल का जवाब तलाशते रहेंगे कि आखिर उनके पिता का कुसूर क्या था? क्या अपने पसीने की वाजिब मजदूरी मांगना इतना बड़ा गुनाह था कि बदले में बेरहम पहियों के नीचे कुचल दिया जाए?
दोस्ती के नाम पर तमाचा है यह खूनी फितरत
यह खौफनाक वारदात समाज के सामने एक गंभीर और तीखा सवाल छोड़ती है: हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ दोस्ती, वफादारी और इंसानियत जैसी पवित्र भावनाएं शराब की चंद बोतलों और चंद कागज़ के नोटों के आगे दम तोड़ देती हैं?
दोस्तों के बीच असहमति या विवाद होना स्वाभाविक है, लेकिन उस विवाद को सिर पर लाठी मारकर और हड्डियों को गाड़ी के टायरों तले रौंदकर 'सुलझाना' यह बताता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में संवेदनाएं किस कदर मर चुकी हैं। कानोता थाने के बाहर रोते-बिलखते परिजन और इंसाफ की गुहार लगाती जनता उस सिस्टम से भी जवाब मांग रही है, ताकि इस दरिंदगी को अंजाम देने वाले कातिल कानून की ऐसी गिरफ्त में आएं कि आइंदा कोई दोस्त, दोस्ती के भेष में छिपा हत्यारा बनने की जुर्रत न कर सके।

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